सोमवार, 3 अगस्त 2009

ज्ञान-गंगा : 10/ धर्म और संप्रदाय


धर्म के प्रति आधुनिक मन में बड़ी उपेक्षा है । और यह अकारण भी नहीं है । धर्म का जो रूप आंखों के सामने आता है, वह न तो रुचिकर ही प्रतीत होता है और न ही धार्मिक । धार्मिक से अर्थ है : सत्य, शिव और सुंदर के अनुकूल । तथाकथित धर्म वह वृत्ति ही नहीं बनाता जिससे सत्य, शिव और सुंदर की अनुभूति होती हो । वह असत्य, अशिव और असुंदर की भावनाओं को बल और समर्थन भी देता है । हिंसा, वैमनस्य और विद्वेष उसकी छाया में पलते हैं । मनुष्य का इतिहास तथाकथित धर्म के नाम पर इतना रक्तरंजित हुआ है कि जिनमें थोड़ा विवेक और बुद्धि है, बहुत स्वाभाविक है कि न केवल उनके ह्रदय धर्म के प्रति उदासीन हो जाएं, बल्कि ऐसे विकृत रूपों के प्रति विद्रोह का भी अनुभव करें । यह बात विरोधाभासी मालूम होगी । किंतु बहुत सत्य है कि जिनके चित्त वस्तुत: धार्मिक हैं, वे ही लोग तथाकथित धर्मों के प्रति विद्रोह अनुभव कर रहें हैं ।

धर्म एक जीवंत प्रवाह है । और निरंतर रुढ़ियों, परम्पराओं और अंधविश्वासों को तोड़कर उसे मार्ग बनाना होता है । सरिताएं जैसे सागर की ओर बहती हैं, और उन्हें अपने मार्ग में बहुत सी चट्टाने तोड़नी पड़ती हैं, और बहुत सी बाधाएँ दूर करनी होती हैं, ठीक वैसे ही धर्म का भी विकास होता है । धर्म के प्रत्येक सत्य के आसपास शीघ्र ही सम्प्रदाय अपने घेरे बांध कर खड़े हो जाते हैं । फिर इन घेरों से न्यस्त स्वार्थ होते हैं । स्वाभाविक है कि जहां स्वार्थ है, वहां संघर्ष भी आ जाए । ऐसे संप्रदाय आपस में लड़ने लगते हैं । यह लड़ाई वैसी ही है, जैसी प्रतिस्पर्धी दुकानों में ग्राहकों के लिए होती है । संगठन संख्या पर जीते हैं । इसलिए येन-केन प्रकारेण अनुयायियों को बढ़ाने की दौड़ चलती रहती है । धर्म के नाम पर भी इस प्रकार शोषण शुरु हो जाता है । मार्क्स ने संभवत: इसी कारण धर्म को जनता के लिए अफीम का नशा कहा है ।

धर्म, संप्रदाय सत्य के खोजी भी नहीं रह जाते । वे तो अपनी-अपनी धारणाओं को हर स्थिति में सत्य सिद्ध करने में संलग्न हैं और इसलिए वे ज्ञान के प्रत्येक नए चरण के शत्रु हो जाते हैं । विज्ञान के साथ धर्म का संघर्ष इसी बात की सूचना है । ज्ञान तो नित्य आगे बढ़ता रहता है और तथाकथित धार्मिक पुरानी और मृत धारणाओं से ही चिपके रहते हैं । इसलिए वे प्रगति के विरोध में प्रतिक्रियावादी सिद्ध होते हैं । ऐसे धर्म-संप्रदाय धर्म के ही मार्ग में बाधा बन जाते हैं । धर्म को जितना अहित साम्प्रदायिक दृष्टि ने पहुंचाया है, उतना किसी और बात ने नहीं । सम्प्रदाय जितने बढ़ते गए, धर्म का उतना ही ह्तास होता गया । सम्प्रदाय तो जड़ आवरण है । धर्म की विकासशील आत्मा के वे कारागृह बन जाते हैं ।

धर्म एक है, लेकिन संप्रदाय अनेक हैं और इसी कारण अद्वय सत्य की उपलब्धि में उनकी अनेकता सहयोगी नहीं हो पाती । जैसे विज्ञान एक है और उसके कोई संप्रदाय नहीं, वैसे ही वस्तुत: धर्म भी एक है और उसके सत्य भी सार्वभौम है । धर्म की संप्रदायों से मुक्ति अत्यंत आवश्यक हो गई है । मनुष्य के विकास में ऐसी घड़ी आ गई है कि धर्म संप्रदाय से मुक्त होकर ही प्रीतिकर, उपादेय और वांछनीय ज्ञान हो सकेगा । संप्रदाय से मुक्त होते ही धर्म के न्यस्त स्वार्थ रूप नष्ट हो जाते हैं । वह दुकानदारी नहीं है और न ही किन्हीं अंधविश्वासों का प्रचार है । वह न संगठन है और न शोषण । फिर भी वह व्यक्ति, सत्ता और सर्व सत्ता के बीच प्रेम और प्रार्थना का अत्यंत निजी संबंध है । धर्म अपने शुद्ध रूप में वैयक्तिक है । वह तो स्वयं का समर्पण है । संगठन से नहीं, साधना से उसका संबंध है । क्या प्रेम के कोई संप्रदाय हैं ? और जब प्रेम के नहीं हैं तब प्रार्थना के कैसे हो सकते हैं ? प्रार्थना तो प्रेम का ही शुद्धतम रूप है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. संप्रदाय:
    जब एक ही तरह की धार्मिक या दार्शनिक परम्परागत प्रथाओं, सिद्धांतों का प्रसार करने वाले, या मानने वाले लोग, इकाट्ठे हो जाते हैं तब एक संप्रदाय का निर्माण होता है

    धर्म:
    धर्म का अर्थ धारण करना, आत्मसात करना, अपने साथ साथ लेकर चलना या स्वीकार करना, और अब क्या स्वीकार करना, उन लौकिक या जगत सम्बन्धी नियमों को, अगर सरल शब्दों में कहें तो नियम, निति, साधुता, भक्ति, न्याय, कर्त्तव्य और व्यवस्था को जो स्वीकारता है धार्मिक कहलाता है ..

    संप्रदाय में परम्परागत प्रथाएँ आती हैं गुरु शिष्य परम्परा से और यह गुरु से जुडी होती हैं, गुरु ने जो कहा मानना होता है इसलिए इसमें कट्टरता आती है, और सभी गुरु अपनी डफली अपना राग अलापने में रहते हैं....

    इन प्रथाओं का धर्म में कोई स्थान नहीं होता, धर्म बहुत ही व्यापक होता है, व्यक्ति विशेष का अपना चुनाव होता है, इसलिए कट्टरता के लिए कोई स्थान नहीं होता....

    आपकी रचना ऐसी है जो किसी भी काल में सामयिक कही जायेगी,और कभी भी इसे ज्वलंत ही कहा जायेगा, आपने बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया हैं, मैंने भी अपने विचार थोड़े से डाल दिए हैं, आपके जितनी मेधा तो नहीं है मुझमें...

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  2. धन्यवाद !!!
    मैं अचंभित हूँ, कि मेरे इस ब्लॉग के लिए आपने एक ही दिन में इतना समय दिया और इतनी सटीक टिप्पणियाँ दी । मैं समझता हूँ कि किसी भी रचना को, उसकी आत्मा को समझने वाला यदि एक भी पाठक मिल जाता है, तो वह सार्थक सिद्ध होती है ।

    पुनश्च: मैं आपका धन्यवाद करता हूँ और यह कहना चाहता हूँ कि आप में मेधा भी है और सशक्त भाषा का प्रभुत्व भी ।

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