शनिवार, 22 अगस्त 2009

रेत और पत्थर

एक कहानी कहती है कि दो दोस्त एक रेगिस्तान से गुजर रहे थे । यात्रा में किसी क्षण दोनों के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस हुई और बहस इस कदर बढ़ गई कि एक मित्र ने दूसरे के गाल पर थप्पड़ मार दिया । दूसरे ने अपमानित महसूस किया ।
लेकिन बिना कुछ बोले, उसने रेत पर लिखा – "आज मेरे सर्वोत्तम मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा ।"
वे चलते रहे । तब वे एक मरु उद्यान में पहुँचे । जहां एक तालाब था । उन्होंने तालाब में स्नान करने की सोची । थप्पड़ खाया हुआ दोस्त दलदल में धँसने लगा, लेकिन दूसरे मित्र ने उसे दलदल से बचा कर बाहर निकाल लिया ।
तालाब से बाहर आने के बाद पहले मित्र ने पत्थर पर लिखा – "आज मेरे सर्वोत्तम मित्र ने मेरी जान बचाई ।"
दूसरे मित्र ने पहले मित्र से पूछा, "जब मैंनें थप्पड़ मारा तो तुमने रेत पर लिखा और अब पत्थर पर लिख रहे हो, ऐसा क्यों ?"
दूसरे मित्र ने जवाब दिया, "जब कभी कोई हमें अपमानित करे तो हमें रेत पर लिखना चाहिए, ताकि क्षमा की हवा इसे मिटा सके, लेकिन जब कभी कोई हमारा अच्छा करे, तो इसे पत्थर पर उकेरना चाहिए, ताकि इसे कोई हवा न मिटा सके ।"

अपने अपमानों को रेत पर लिखना और दूसरों की अच्छाइयों को पत्थर पर तराशना सीखिए ...

एक मिनट में हमें कोई विशेष व्यक्ति मिल सकता है, जो एक घंटे में हमें प्रशंसनीय मालूम हो, और एक दिन में प्रेम करने लायक प्रतीत हो, जिसे जीवन भर भूलाना कठिन हो, पत्थर पर तराशे शब्दों की तरह ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारती जी,
    कहाँ से ले आते हैं आप इतनी अच्छी अच्छी लघु कथाएँ...जिन्हें पढ़ते साथ ही बदल जाने का मन करता है....आपके द्वारा उधृत सभी कथाएँ आत्मसात करने योग्य हैं और इन कथाओं की सुन्दरता यह हैं कि जीवन में इन्हें अपनाना भी कठिन नहीं होगा...बस सोच लेना होगा......
    अतिसुन्दर शब्द अब काफी नहीं है कुछ और ही सोचना पड़ेगा.....लेकिन अभी तो, आपका ह्रदय से धन्यवाद करते हैं .....

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  2. धन्यवाद !!!
    बस अगर इन छोटी-छोटी कथाओं से जीवन में सजगता बढ़ती है, तो इसमें इनकी सार्थकता है । ये कथाएँ बहुत पहले से कही जा रही हैं । मैं तो यहाँ इनका पुनर्प्रस्तुतिकरण कर रहा हूँ ,अपने शब्दों में । इसी लिए इनको बोध कथा की श्रेणी में रखा जाता है ।

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