बुधवार, 5 अगस्त 2009

मनुष्यता की भूल


सत्य की कोई भी धारणा चित्त को बंदी बना लेती है । सत्य को जानने के लिए चित्त की परिपूर्ण स्वतंत्रता अपेक्षित है । चित्त जब समस्त सिद्धांतों, शास्त्रों से स्वयं को मुक्त कर लेता है, तभी उस निर्दोष और निर्विकार दशा में सत्य को जानने में समर्थ हो पाता है । व्यक्ति जब शून्य होता है तभी उसे पूर्ण को पाने का अधिकार मिलता है ।


मनुष्य के सारे जीवन सूत्र उलझ गए हैं । उसके संबंध में कोई भी सत्य सुनिश्चित नहीं प्रतीत होता । न जीवन के अथ का पता है, न अंत का । पहले के समय में जो धारणाएं स्पष्ट प्रतीत होती थी, वे सब अस्पष्ट हो गई हैं । धारणाओं के पुराने भवन तो गिर गए पर नए निर्मित नहीं हुए । पुराने सब मूल्य मर गए हैं, या मर रहें हैं और कोई नए मूल्य अंकुरित नहीं हो पाते । एक ही नया मूल्य अंकुरित हुआ है कि यह भौतिक जीवन ही सब कुछ है । परंतु इस नए मूल्य ने संघर्ष, द्वंद्व और युद्ध तथा अशांति को जन्म दिया है । इस भांति जीवन दिशाशून्य होकर ठिठका सा खड़ा है । यह किंकर्तव्य-विमूढ़ता हमारी प्रत्येक चिंतना और क्रिया पर अंकित है । स्वभावत: ऐसी दशा में हमारे चित्त यदि तीव्र संताप से भर गए हों, तो कोई आश्चर्य नहीं । गंतव्य के बोध के बिना गति एक बोझ ही हो सकती है । जीवन के अर्थ को जाने बीना जीना एक भार ही हो सकता है । अर्थ और अभिप्राय: शून्य उपक्रम अंतत:अर्थ और अभिप्राय: को कैसे जन्म दे सकते हैं ? जिस यात्रा का प्रथम चरण ही अर्थहीन हो, तब तो उसका अंतिम चरण अर्थ नहीं बन सकता । फिर जो पूरी की पूरी यात्रा ही अर्थहीन हो, तब तो अंत में अनर्थ ही हाथ आएगा । यह कोई कोरे सिद्धांत की बात नहीं है । यह तो सीधा अनुभव ही है । चारों ओर हजारों चेहरों पर छाई हुई निराशा, लाखों आंखों में घिरा हुआ अंधकार, करोड़ों ह्रदयों पर ऊब और संताप का भार इसका स्पष्ट प्रमाण है । खोज करने पर भी शांत, संतुष्ट और आनंदित व्यक्ति का मिलना दुर्लभ होता जा रहा है । अभी भी ऋतुराज आता है और सृष्टि सुमनों तथा उनकी सुगंध से भर जाती है । पावस में मेघमालाएं उठती , दामिनी दमकती, वर्षा होती, इंद्रधनुष निकलता और हरियाली छा जाती है । ऊषा और संध्या की सुनहरी आभा से पूर्व और पश्चिम नित्य ही आलोकित होते हैं । उदय होते हुए भास्कर की आभा और नित्य प्रति बढ़ती हुई चंद्रमा की कलाएं अपना सौंदर्य बिखेरती हैं । विविध समीर बहता है और पंछी अपना मधुर राग अलापते हैं । किंतु वे मनुष्य कहां हैं, जिनके ह्रदय संगीत से भरे हों और जिनकी आंखों से सौंदर्य झरे ? निश्चय ही मनुष्य के साथ कुछ भूल हो गई है । निश्चय ही उसके भीतर कुछ टूट और खो गया है । निश्चय ही मनुष्य जो होने को पैदा हुआ है, वही होना भूल गया है ।


यह भूल इसलिए हुई कि मनुष्य जो उसके बाहर है, उसे समझने और जीतने में अतिशय संलग्न हो गया है । उसकी बाहर की अति संलग्नता ने भीतर की भूमि से क्रमश: उसे अपरिचित कर दिया है । धीरे-धीरे यह स्मरण ही न रहा, कि हमारे भीतर भी जानने और जीतने को एक जगत है ।बाहर के जगत में मिली विजय क्रमश: उसे और बाहर ले गई । नए-नए अविजित क्षितिज उसे आकर्षित करते रहे और उनके प्रलोभनों में वह स्वयं से ही दूर बढ़ता गया ।जगत का कोई अंत नहीं है । बाहर अनंत विस्तार है । यह संभव नहीं कि कभी भी उस पूरे विस्तार को हम अपनी मुट्ठी में ले सकेंगे । जितना हम जानते हैं, जगत उतना ही बड़ा होता जाता है । जितना हम उसे जीतते हैं, उतना ही वह अविजित क्षेत्र बड़ा होता जाता है । इस दौड़ में स्वर्णमृग तो हाथ आता नहीं, बल्कि स्वयं की सीता से दूर जरुर हुए जाते हैं । राम ने जैसा अंत में पाया कि स्वर्ण मृग तो मिला नहीं, लेकिन सीता अवश्य खो गई । ऐसी ही दशा पूरी मनुष्यता की है । बाहर के सर्व को खोजने और जीतने हम निकले और अंत में यह पा रहें हैं कि भीतर के स्व को ही हार गए और खो बैठे । मनुष्य की चेतना को वापिस उसके स्व में प्रतिष्ठित करना अपरिहार्य हो गया है ।ऐसा होने पर ही हम स्वयं को जानने में समर्थ हो सकेंगे । और उस ज्ञान के प्रकाश से ही जीवन की उलझी गुत्थी सुलझ पाएगी । यह अज्ञान चरम अज्ञान है कि जो स्वयं को ही न जानता हो, वह शेष सबको जानने में संलग्न हो । प्रकृति नहीं, पुरुष सर्वप्रथम जानने योग्य है । उस ज्ञान के आधार पर शेष सब ज्ञान सार्थक हो सकता है । उस मूल ज्ञान के अभाव में और किसी भी भांति के ज्ञान का कोई भी मूल्य नहीं । मनुष्य प्रथम है, शेष सब पीछे है । मनुष्य को सबसे अंत में रखकर ही भूल हो गई है ।

2 टिप्‍पणियां:

  1. भारती जी,
    आपके इस लेख से मैं कितनी प्रभावित हुई हूँ यह आपको बता पाने की क्षमता मुझमें नहीं है...
    इस लेख का एक एक शब्द सत्य और कुछ नहीं..
    यूँ लगा मेरे मन के उदगार उठ बैठे हों और चल कर आपकी इस रचना में समावित हो गए हों.. जीवन के प्रति यह दृष्टि, पता नहीं कितने समय से मुझे सालती रही है..आज इसे पढ़ कर मन कुछ हल्का हो गया हैं..अपने आस-पास तेजहीन चेहरे और दिशा हीन जीवन देख -देख कर वितृष्णा सी होने लगी थी..लेकिन इस लेख ने थोडा संबल दिया और बताया कि मैं ही सिर्फ 'पागल' नहीं हूँ.... क्षमा चाहती हूँ मेरे बारे में बहुतों कि यही धारणा है..
    बस इतना ही और कहूँगी, यह मेरा सौभाग्य है कि आपके ब्लॉग का पता मुझे मिला...
    धन्यवाद..

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  2. जीवन के प्रति
    मूल प्रश्नों को
    पागलपन क्यों मान लिया जाता है ?

    इसलिए क्योंकि
    पागलपन की हद से गुजर कर ही
    इन मूल प्रश्नों का जवाब मिलता है

    शुभ है कि आप में जीवन के
    प्रति इन मूल प्रश्नों की प्यास है
    जुनून की हद तक !!!

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