शनिवार, 1 जनवरी 2011

मन की फड़फड़ाहट

उस दिन हवा बहुत वेग से बह रही थी । एक झेन आश्रम की ध्वजा फड़फड़ा रही थी । एक झेन साधक ने यह नजारा देख कर कहा, "देखो, धर्म की ध्वजा फड़फड़ा रही है ।" 

दूसरे साधक ने कहा, "नहीं,ध्वजा केवल नजर आ रही है, असल में तो हवा फड़फड़ा रही है ।"

तीसरा साधक जो अब तक दोनों साधकों की बात सुन रहा था,  उनके निकट आ कर धीरे से बोला, "ध्वजा नजर आ रही है, हवा महसूस हो रही है, किंतु फड़फड़ाहट तो मन में हो रही है ।"

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नव वर्ष 2011 में इस मन की फड़फड़ाहट शांत हो, इसी मंगल कामना के साथ इस ब्लॉग के सभी पाठकों को नव वर्ष 2011 की हार्दिक शुभकामनाएं ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. कितनी बड़ी बात इतने कम लफ़्ज़ों में कह डाली ... कितना सरल ... वाह ...

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  2. मनोज जी!वर्त्तमान वर्ष आपके जीवन की फड़फड़ाहट को शांति प्रदान करे!एक गूढ़ झेन कथा से वर्ष का आरम्भ करने के लिये आभार!!

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  3. मनोज जी!वर्त्तमान वर्ष आपके जीवन की फड़फड़ाहट को शांति प्रदान करे!एक गूढ़ झेन कथा से वर्ष का आरम्भ करने के लिये आभार!!

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  4. वाकई कठिन अभिव्यक्ति को आसानी से कहा गया है. मेरे मन मे तो फड़फडाहट होती ही रहती है. अब इसे ठीक करूँगा, रिटायर हो कर.

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