मंगलवार, 18 मई 2010

षट्दर्शन

भारत का आस्तिक दर्शन न्याय, वैशेषिक, साख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तरमीमांसा (वेदांत)  में बाँटा गया है । इतिहास वेत्ता मानते हैं कि ई.पू. पाँचवीं शताब्दी से लेकर ई.पू. पहली शताब्दी तक इन दर्शनों का विकास हुआ और इन्होंने व्यवस्थित रूप प्राप्त कर लिया । ये दर्शन आस्तिक इन अर्थों में नहीं हैं कि ये ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, बल्कि इन अर्थों में आस्तिक हैं कि ये वेदों के प्रमाण में आस्था रखते हैं । पूर्व मीमांसा और उत्तर-मीमांसा तो वैदिक ग्रंथों पर आधारित हैं, जबकि न्याय, वैशेषिक, सांख्य और योग स्वतंत्र आधार रखते हैं ।

1. न्याय दर्शन :: इस दर्शन के प्रणेता गौतम ऋषि माने जाते हैं । जिन्होंने न्याय सूत्रों में इस दर्शन के सिद्धांतों का विवेचन किया है । इस दर्शन में बुद्धि को सर्वोच्च स्थान पर रखा गया । इस दर्शन का अभिमत है कि बुद्धि के द्वारा सब कुछ जाना जा सकता है । 

2. वैशेषिक दर्शन :: कणाद इस दर्शन के प्रणेता हैं । परमाणुवाद वैशेषिक दर्शन की विशेषता है । परमाणु जगत के उपादान कारण माने जाते हैं । परमाणु एकत्रित व पृथक होते रहते हैं । यह कार्य अनंत काल से चला अआ रहा है । अग्नि व पृथ्वी के परमाणुओं द्वारा ईश्वर के ध्यान-मात्र से ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाता है । 

3. सांख्य :: इस दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि हैं । इस दर्शन में पच्चीस तत्व माने गए हैं , जिनमें पुरुष व प्रकृति मुख्य हैं । जब तक पुरुष प्रकृति से अपना पृथकत्व नहीं जान लेता तब तक संसार का नाटक चला करता है । 

4. योग :: इस दर्शन के प्रणेता पतंजलि मुनि माने जाते हैं । योग में चित्त-वृत्तियों के निरोध पर बल है । चित्त वृत्ति के निरोध के लिए अष्टांग योग की साधना आवश्यक है ।

5. पूर्व मींमासा :: इसके प्रणेता जैमिनि मुनि हैं । इसे कर्म मीमांसा भी कहते हैं, क्योंकि इसका संबंध कर्मकांड से है । इसके अनुसार नित्य यज्ञादि करने से ही सच्ची मुक्ति प्राप्त हो सकती है । 

6. उत्तर मीमांसा (वेदांत) :: इसके प्रणेता बादरायण या व्यास मुनि माने जाते हैं । इस दर्शन के अनुसार प्रमाण दो हैं : श्रुति (प्रत्यक्ष) व स्मृति (अनुमान) । इस जगत् में ब्रह्म ही सत्य है । पुरुष व प्रकृति उसी के दो परिवर्तित स्वरूप हैं । यह संसार ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है ।  यह उसकी लीला है ।  

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