शनिवार, 5 जून 2010

आवाज़

एक झेन साधक की मृत्यु हुई । उसके आश्रम के निकट ही एक अंधा वृद्ध रहता था । साधक की शोकसभा में उसने कहा –

“मैं जन्म से अंधा हूँ । लोगो के चेहरे नहीं देख सकता । लेकिन उनकी भावनाएँ उनकी आवाज़ से पहचान पाता हूँ । आमतौर पर मैं जब किसी को बधाई देते सुनता हूँ, तो आवाज के पीछे छिपी ईर्ष्या की गूँज भी मुझे सुनाई देती है । जब किसी को सांत्वना देते हुए सुनता हूँ तो छिपी हुई खुशी भी मुझ से बच नहीं पाती, कि चलो यह दु:ख हमें तो नहीं है । पर इस साधक को मैंने जब भी सुना, वह वही था, जो वह कह रहा था । जब यह बधाई देता था तो अंदर से बाहर तक खुश होता था । जब दु:ख जताता था तो सचमुच दु:खी होता था । “

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरा बिचार दिए हैं आप सोचने के लिए.. अपका बिचार हमरे आज का पोस्ट का जनक है... आसिर्बाद देने जरूर आइएगा!! कोसिस किए हैं कि आपके भावनाओं को अछूता रखा सकें, कहाँ तक सफल हुए हैं ई त आप ही बता सकते हैं...

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपने तो छोटे से दृष्टांत में काफी कुछ कह दिया

    बहुत अच्छी पोस्ट

    उत्तर देंहटाएं
  3. मान्यवर ! यह एक झेन कथा है ... जो हमें संपूर्णता से और भरपूर वैसा ही जीने के लिए प्रेरित करती है, जैसे हम हैं । कृपया इसे मेरी रचना न समझें ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बस खुद जैसा हो जाना ही
    कितना मुश्किल काम हो गया है?

    उत्तर देंहटाएं
  5. गहरा बिचार ......
    "वह वही था, जो वह कह रहा था"

    उत्तर देंहटाएं