बुधवार, 23 जून 2010

एकाकी जीवन

एकाकी है यह जीवन
चिंतन बहुत
मनन बहुत
पर है सूना बहुत
कोई नहीं जिसे समझा सकूँ
इस मन की पीड़ा को
इस चिंता के विषय को
इस मनन के बिंदु को
बस छटपटा कर रह जाता हूँ
एक अभाव से भर जाता हूँ
कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ
क्या मैं स्वयं जैसा होने को हूँ अभिशप्त
या है यह स्वयं को समझने की सजा
कि-
चिंतन है
मनन है
विचार है
पर कोई साथी नहीं जिसे समझा सकूँ
ठीक वैसा जैसा मैं हूँ !!!

10 टिप्‍पणियां:

  1. chitan manan aatm manthan bhavishy sudhar dete hai
    Aaj ke vyst jeevan me sabhee ko apanee padee hai samay kanha ki doosaro ko samjhane baithe..........par nirasha ko jagah mat theejiye...........ye ghatak siddh hotee hai.........
    ho sakta hai koi ho jo ise vytha ko samajhata bhee ho............
    acchee post ke liye aabhar.

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  2. इस मन की पीड़ा को
    इस चिंता के विषय को
    इस मनन के बिंदु को
    बस छटपटा कर रह जाता हूँ
    एक अभाव से भर जाता हूँ
    कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ

    वैसे क्यों हैं ....कुछ संस्कार तो खून में ही होते हैं ....जिसे लाख चाहें हम बदल नहीं पाते ....बस अच्छा इन्सान बने रहे यही काफी है ....!!

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  3. इस मन की पीड़ा को
    इस चिंता के विषय को
    इस मनन के बिंदु को
    बस छटपटा कर रह जाता हूँ
    एक अभाव से भर जाता हूँ
    कि मैं जैसा हूँ वैसा क्यों हूँ
    bahut sundar lagi rachna ,aadat badalana sambhav nahi ....

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  4. सुन्दर प्रस्तुति

    दूसरे को समझाने का आग्रह भी क्यों!
    खुद समझे यही क्या बहुत नहीं.

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  6. आपके जईसा दूसरा त बस आईना हो सकता है... गाने वाला लोग आईना के सामने गाता है, ताकि देकेहे कि चेहरा बिगड़ त नहीं रहा है, अभिनेता आईना के सामने अभिनय करता है , ताकि देखे कि एक्स्प्रेसन ठीक त है न, डांस करने वाला आईना के सामने डांस करता है ताकि देखे कि एस्टेप ठीक है कि नहीं... आईना से अच्छा कोई दोस्त नहीं, एकदम अपने जईसा… इसके सामने रोने से मन हलका होताहै अऊर ई किसी को बोलता भी नहीं है...

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  10. मनोज जी . सब आपकी तरह नही हो सकते . प्रयास ही किया जा सकता है । यही बुद्ध और गाँधी ने किया ।
    रचना प्रशंसनीय ।

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