बुधवार, 2 जून 2010

दमन

आज फिर हम ओशो के एक प्रवचन से चुनी हुई कहानी को प्रस्तुत कर रहें हैं । यह कहानी दमन और संयम के सही अर्थ खोलती है ।

दमन
एक संध्या दो भिक्षु किसी पहाड़ी नदी को पार करते थे । एक था वृद्ध संन्यासी, दूसरा युवा । वृद्ध आगे था, युवा पीछे । नदी तट पर एक युवती खड़ी थी । वह भी नदी पार करना चाहती थी । किंतु अपरिचित पहाड़ी नदी थी और तीव्र उसका प्रवाह था । युवती उतरने का साहस नहीं कर पा रही थी । वृद्ध संन्यासी उसके निकट आया तो उसकी दुविधा देख उसने सोचा कि उसे हाथ का सहारा दे दूँ । लेकिन यह क्या ? हाथ का सहारा देने के विचार के आते ही, जैसे कोई सोया सर्प अचानक फन उठा ले ऐसे ही काम-वासना उसके रोयें-रोयें में कांप गई । शरीर वृद्ध था, पर वासना अभी भी युवा थी । विकारों को दबाया था, पर वे मौजूद थे । दमन के अनेक वर्ष एकदम विलीन हो गए । बहुत तप संघर्ष किया था, उसकी कोई रेखा भी शेष न रही ।

यह क्या हुआ ? क्या सब श्रम जल पर रेखाएँ खींचने जैसा ही व्यर्थ नहीं हो गया था ? वह अपने से ही भयभीत वृद्ध आंखें नीचे झुकाकर नदी पार करने लगा । पर आंखे झुकाने या बंद करने से तो कुछ होता नहीं है । स्त्री या पुरुष बाहर नहीं हैं, वे तो भीतर ही छिपे हैं । काश ! विकार बाहर होते तो उन्हें छोड़कर भागा जा सकता था , लेकिन वे तो भीतर हैं, भागने वाले के साथ हैं । उन्हें छोड़कर भागने का उपाय नहीं । उन्हें दमन करने का भी उपाय नहीं , क्योंकि दमन से वे आप में और भी गहरे प्रविष्ट हो जाते हैं और आपके चित्त-भवन के और भी अंधरे, अज्ञात और अचेतन प्रकोष्ठों में उनका निवास हो जाता है । वे चेतन (कॉन्सस) से हट जाते हैं, पर अचेतन (अन्कान्सस) के अतिथि हो जाते हैं ।

उस वृद्ध ने नदी पार की । उसने पीछे नहीं देखा, किंतु उसका मन पीछे की ओर ही भाग रहा था । वह युवती तो उसके शरीर के पीछे थी,किंतु मन में युवती आगे थी । उसके मन में अनेक विकल्प उठे । सोचता था, सहारा दे ही क्यों न दिया ? लेकिन एक वासनाग्रस्त लिप्सा भी उसके मन में व्याप्त होती चली गई । वह बहुत घबड़ा गया और ग्लानि से भर गया । उसने भगवान का स्मरण किया और कहा, मुझे क्षमा करें । बड़ी भूल हुई है । यह मैंने क्या कर दिया है ? यूं ऊपर से उसने कुछ भी नहीं किया था, पर असली करना तो सब भीतर घटित होता है । बाहर तो केवल उसकी प्रतिछायाएँ ही आती हैं । विचार ही असली कर्म है । बंधन और मोक्ष वही है । वे विचार फिर वस्तुत: कर्म में आते हैं या नहीं इसमें बहुत भेद नहीं पड़ता ।

वह वृद्ध संन्यासी जब नदी के उस पार पहुंचा, तो उसे याद आया कि उसके पीछे उसका युवा साथी भी आ रहा है । वह चिंतित हुआ कि कहीं वह भी उस पाप-चिंतना में न पड़ जावे, जिससे वह स्वयं पीड़ित और पतित हुआ है । उसने लौटकर देखा – और वह आंखें फाड़े देखता ही रह गया ? उसे अपनी आंखों पर विश्वास करना मुश्किल था । वह युवक उस युवती को कंधे पर लिए नदी पार हो रहा था । उसे आग लग गई । और वह उत्तप्त और अशांत हो गया । उसका स्वयं का काम क्रोध में परिणत हो गया ।

फिर वे बड़ी देर तक आश्रम की ओर चुपचाप चलते रहे । वृद्ध इतना क्रुद्ध था कि कुछ भी बोल नहीं सका । अंतत: जब वे आश्रम में प्रवेश करने लगे, तो उसका बांध टूट ही गया । वह बोला, आज तुमने बहुत पाप किया है । विकारों के उस ढ़ेर को तुमने कंधे पर क्यों लिया था ? उस युवती को स्पर्श क्यों किया ? अब मैं इस पाप के संबंध में गुरु को बिना बताए कैसे रह सकता हूँ ? तुमने संन्यास का और शिल का नियम भंग किया है । उस युवक ने यह सुना और उत्तर में कहा, क्षमा करें । उस युवती को मैं नदी तट पर ही छोड़ आया हूँ, लेकिन प्रतीत होता है कि आप उसे अभी भी अपने कंधे पर लिए हुए हैं ।



6 टिप्‍पणियां:

  1. शायद इसी कारण ओशो ने प्रथम दीक्षा एक स्त्री को दी थी... वे कहते हैं कि यह उनके द्वारा किया गया बुद्ध का प्रायश्चित था, क्योंकि स्वयम बुद्ध ने स्त्री को दीक्षा से वंचित रखा था अपने आश्रम में..

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  2. tatsthta ahum hai varna tup kisee labh ka nahee......jain dharm bhee sayyam tyag ka hee marg dikhata hai........
    bahut achha lagata hai aapke blog par aakar............
    kai var tippanee chodne kee yogyta par hee mai apane aap se sawal kar baithtee hoo............
    Aabhar

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  3. osho ke jeevan ka chhan-chhan nirala hai. kahani na keval prerak balki nyi drasti pradan karti hai.

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