रविवार, 6 मई 2012

बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से

इस समय विश्व में महामारी के स्तर पर एक रोग उभर रहा है जिसके दस प्रतिशत से अधिक शिकार भारत में हैं। रोग का नाम है डिमेंशिया। यह एक सिंड्रोम है जिसके विकास में मस्तिष्क के बहुत से विकार सहायक होते हैं। इस सिंड्रोम के चलते धीरे-धीरे या कभी बहुत तेजी से मस्तिष्क का क्षय होने लगता है और अंतत: व्यक्ति को समय और स्थान का बोध समाप्त होने लगता है,भाषा कभी समझ आती है और कभी नहीं,लोगों को पहचानने की शक्ति कम या बिल्कुल समाप्त हो जाती है,दैनिक क्रिया-कलापों को करना लगभग असंभव हो जाता है।

इस समय पूरे विश्व में लगभग साढ़े तीन करोड़ लोग डिमेंशिया से ग्रस्त हैं,जिनमें से सैंतीस लाख लोग भारत में हैं। वर्ल्ड हैल्थ ऑर्गेनाइज़ेशन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सत्तर लाख लोग हर साल डिमेंशिया के शिकार हो रहे हैं,अर्थात हर चार सैकिंड में विश्व में कहीं न कहीं कोई इसकी चपेट में आ रहा है।

डब्लू एच ओ की इस नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार सन्2030 तक छह करोड़ और 2050 तक कोई पंद्रह करोड़ लोग विश्व में डिमेंशिया से ग्रस्त होंगे। सबसे अधिक क्षति भारत,चीन और ब्राज़ील की होगी क्योंकि अपवाद छोड़कर यह रोग 60 वर्ष की आयु के ऊपर ज्यादा संभावित होता है और शीघ्र ही ये देश संसार में वृद्धों की सबसे बड़ी जनसंख्या लिए होंगे।

जन्म के पहले क्षण से लेकर मनुष्य के अंतिम क्षण तक मस्तिष्क क्रियाशील रहता है,हमारे शरीर और मन में होने वाली एक-एक क्रिया को संचालित भी करता है और उनसे प्रभावित भी होता है। इस सतत क्रियाशील यंत्र को अन्य किसी भी यंत्र की तरह सुचारू रूप से चलते रहने के लिए समुचित व्यायाम और विश्राम की जरूरत है। इस यंत्र का विश्राम है अपनी स्वाभाविक स्थिति में केवल शारीरिक क्रियाओं का संचालन करना,और व्यायाम है-अनजान परिस्थितियों का सामना,खोज,अन्वेषण,सृजन। व्यर्थ की मानसिक उहापोह इसका व्यायाम नहीं,इस पर अतिरिक्त बोझ हैं। और आधुनिक जीवन शैली में तो ये बोझ अतिरिक्त ही नहीं अतिशय हो चलें है- चैनल दर चैनल टीवी के कार्यक्रम,विज्ञापन,खबरें,सोशल नेटवर्किंग साइट्स...। न मस्तिष्क को विश्राम है,और मजे की बात कि समुचित व्यायाम भी नहीं।

ओशो कहते हैं,कोई जरूरत नहीं है कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मस्तिष्क की क्षमता कम होती जाए। मस्तिष्क अंतिम क्षण तक युवा और तरोताजा रह सकता है, यदि हम मन को मौन करने की कला सीख जाएं। दिन में कम से कम कुछ क्षण ऐसे हों जब आप मौन में डूबें। जैसे-जैसे यह कला गहराती जाएगी,आप पाएंगे कि दिन में कई क्षण आते हैं जब आपका मन नहीं चल रहा,आप पूरी तरह से मौन में हैं। ये क्षण मस्तिष्क के लिए विश्राम के होंगे। विश्राम के बाद मस्तिष्क और स्पष्ट होकर,और शुद्ध होकर,और ऊर्जा से भरकर आपका सहयोगी होगा।

कनाडा में डिमेंशिया पर एक लंबी क्लिनिकल शोध के बाद यह पाया गया कि अपनी मातृभाषा के अतिरिक्त जो लोग किसी दूसरी भाषा का भी उपयोग करते हैं,उनमें डिमेंशिया की संभावना एकभाषी लोगों की तुलना में कुछ कम होती है। इस निष्कर्ष का विश्लेषण करते हुए यह कहा गया कि दूसरी भाषा का उपयोग करते हुए हमारे मस्तिष्क में विश्राम और व्यायाम की एक लय चलती है। उस समय मस्तिष्क में अनुवाद की सतत प्रक्रिया एक व्यायाम होती है और बीच के गैप में एक विश्राम।

हो सकता है यह शोध उन लोगों के संबंध में बहुत सच हो जो किसी अन्य भाषा को नया-नया सीख रहें हों या उसमें कभी भी पूरी तरह पारंगत न हो पाए हों। लेकिन पूरी तरह पारंगत हो गए लोगों में यह गतिविधि बहुत कम होगी।

आइए इसी मनोशारीरिक तथ्य के परिप्रेक्ष्य में जिबरिश की बात करें। जो कि ओशो ने हमें एक ध्यानविधि की तरह दी है। यह मन के लिए एक संपूर्ण विश्राम है। जिबरिश करते समय,ओशो कहते हैं हम अनर्गल शब्द बोलें जिनका कोई अर्थ न हो। वे कहते हैं इसका उपयोग हम रेचन की तरह न करें। बल्कि ऐसे करें जैसे कि एक ऐसी भाषा बोल रहें हैं जो हम नहीं जानते। ऐसी भाषा बोलते हुए निश्चित ही सोचने की प्रक्रिया रुक जाएगी और मस्तिष्क को विश्राम मिलेगा। आप को जब पता ही नहीं कि आप क्या बोल रहे हैं,तो उसके साथ कोई भाव भी नहीं जुड़े होंगे। आप केवल एक बच्चे की तरह उस बोलने का आनंद लेंगे। यह क्रिया मस्तिष्क के लिए ऐसी ही है जैसे कि शरीर के लिए स्विमिंग या जॉगिंग-स्वास्थ्यकारी।

उसके बाद,ओशो कहते हैं कि हम शरीर को बिलकुल लेट गो में छोड़कर लेट जाएं-जैसे स्विमिंग के बाद बीच पर लेटे हुए नर्म धूप का आनंद।

आइए मौन हों,आनंदित हों और बचें हर चार सेकंड में डिमेंशिया की दस्तक से।

-संजय भारती
संपादक,यैस ओशो,
मई-2012माह के अंक का संपादकीय

6 टिप्‍पणियां:

  1. मनोज जी! मैं इस बीमारी से बचा रह सकता हूँ क्योंकि दिन भर में कम से कम चार भाषाएँ तो बोलता ही रहता हूँ लगातार.. मस्तिष्क को कम से कम भाषा के व्यायाम से वंचित नहीं रखता मैं!!
    जिबरिश की साधना से याद आया कि मनोविज्ञान में भी एक ऐसा प्रयोग है जिसमें अनर्गल शब्दों (नॉनसेन्स सिलेबल्स) को पहचानने और याद रखने का प्रयोग करवाया जाता है!!
    वैसे भी यह आँख खोलने वाली पोस्ट है!! सामायिक भी!!

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  2. aabhaar aapka - bahut acchi prastuti | osho sahi kahte hain - kyonki ve jaante hain maun ka mahatv |

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  3. आँखें खोलने वाला आलेख! कुछ बातें यदा-कदा सुनी थीं परंतु सब कुछ एक जगह पाकर अच्छा लगा। समय रहते इस समस्या पर ध्यानाकर्षण ज़रूरी है। धन्यवाद!

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