गुरुवार, 16 अगस्त 2012

उच्च आत्मा की ओर:ओशो का आह्वाहन

हिंदुस्तान में दो विपरीत ढंग के प्रयोग पचास सालों से चले। (वर्ष 1967). एक प्रयोग गांधी ने किया। एक प्रयोग श्री अरविंद ने। गांधी ने एक-एक मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाने का प्रयोग किया। उसमें गांधी सफल होते हुए दिखाई पड़े,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। जिन लोगों को गांधी ने सोचा था कि इनका चरित्र मैंने उठा लिया,वे बिलकुल मिट्टी के पुतले साबित हुए। जरा पानी गिरा और सब रंग-रौगन बह गया। बीस साल में रंग-रौगन बह गया। वह हम सब देख रहे हैं। कहीं कोई रंग-रौगन नहीं है। वह जो गांधी ने पोतपात कर तैयार किया था,वह वर्षा में बह गया। जब तक पद की वर्षा नहीं हुई थी तब तक उनकी शकलें बहुत शानदार मालूम पड़ती थी और उनके खादी के कपड़े बहुत धुले हुए दिखाई पड़ते थे और उनकी टोपियां ऐसी लगती थी कि मुल्क को ऊपर उठा लेंगी। लेकिन आज वे ही टोपियां मुल्क में भ्रष्टाचार की प्रतीक बन गई हैं। गांधी ने एक प्रयोग किया था,जिसमें मालूम हुआ कि वे सफल हो रहे हैं,लेकिन बिलकुल असफल हो गए। गांधी जैसा प्रयोग बहुत बार किया गया और हर बार असफल हो गया। 

श्री अरविंद एक प्रयोग करते थे जिसमें वे सफल होते हुए मालूम पड़े,लेकिन उनकी दिशा बिलकुल ठीक थी। वे यह प्रयोग कर रहे थे कि क्या यह संभव है कि थोड़ी-सी आत्माएं इतने ऊपर उठ जाएं कि उनकी मौजूदगी,दूसरी आत्माओं को ऊपर उठाने लगे और पुकारने लगे और दूसरी आत्माएं ऊपर उठने लगें। क्या यह संभव है कि एक मनुष्य की आत्मा ऊपर उठे और उसके साथ अन्य आत्माओं का स्तर ऊपर उठ जाए। यह न केवल संभव है,बल्कि केवल यही संभव है। दूसरी आज कोई बात सफल नहीं हो सकती। आज तो आदमी इतने नीचे गिर चुका है कि अगर हमने यह फिक्र की कि हम एक-एक आदमी को बदलेंगे तो शायद यह बदलाहट कभी नहीं होगी। बल्कि जो आदमी उनको बदलने जाएगा,उनके सत्संग में उसके खुद के बदल जाने की संभावना ज्यादा है। उसके बदले जाने की संभावना है कि वह भी उनके साथ भ्रष्ट हो जाएगा। आप देखते हैं कि जितने जनता के सेवक,जनता की सेवा करने जाते हैं,थोड़े दिनों में पता चलता है कि वे जनता की जेब काटने वाले सिद्ध होते हैं। वे गए थे सेवा करने,वे गए थे लोगों को सुधारने,थोड़े दिन में पता चलता है कि लोग उनको सुधारने का विचार करते हैं। 

मनुष्य जाति की चेतना का इतिहास यह कहता है कि दुनिया की चेतना किन्हीं कालों में एकदम ऊपर उठ गई थी,शायद आपको इसका अंदाज न हो। 2500 वर्ष पहले,हिंदुस्तान में बुद्ध पैदा हुए, प्रबुद्ध कात्यायन हुआ,मावली गोसाल हुआ,संजय विलाटीपुत्र हुआ। यूनान में सुकरात हुआ,प्लेटो हुआ,अरस्तू हुआ,प्लटनस हुआ। चीन में लाओत्से,कंफ्यूशस हुआ,च्वांगतसे हुआ। 2500 साल पहले सारी दुनिया में कुल दस-पंद्रह लोग इतनी कीमत के हुए कि उन एक सौ वर्षों में दुनिया की चेतना एकदम आकाश छूने लगी। सारी दुनिया का स्वर्ण युग आ गया,ऐसा मालूम हुआ। इतनी प्रखर आत्मा मनुष्य की कभी प्रकट नहीं हुई थी। महावीर के साथ पचास हजार लोग गांव-गांव घूमने लगे। बुद्ध के साथ हजारों भिक्षु खड़े हो गए और उनकी रोशनी और ज्योति गांव-गांव को जागाने लगी। जिस गांव में बुद्ध अपने दस हजार भिक्षुओं को लेकर पहुंच जाते,तीन दिन के भीतर उस गांव की हवा के अणु बदल जाते। जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु बैठ जाते,जिस गांव में वे दस हजार भिक्षु प्रार्थना करने लगते उस गांव से जैसे अंधकार मिट जाता,जैसे उस गांव में रोशनी छा जाती,जैसे उस गांव के हृदय में कुछ फूल खिलने लगते,जो कभी नहीं खिले थे। कुछ थोड़े से लोग उठे ऊपर और उनके साथ ही नीचे के लोगों की आंखें ऊपर उठीं। नीचे के लोगों की आंखें तभी ऊपर उठती हैं जब ऊपर देखने जैसा कुछ हो। लेकिन ऊपर देखने जैसा कुछ भी नहीं है,नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है,उतनी बड़ी तिजोरी बना लेता है। जो आदमी जितना नीचे उतर जाता है वह उतने कीमती जवाहर खरीद लाता है। नीचे देखने जैसा बहुत कुछ है। दिल्ली बिलकुल गड्ढ़े में बस गई है। बिलकुल नीचे। वहां नीचे देखो,पाताल में दिल्ली है। तो जिसको दिल्ली पहुंचना हो उसको पाताल में उतरना चाहिए। नीचे-नीचे उतरते जाना चाहिए। ऊपर देखने जैसा कुछ नहीं है। किसकी तरफ देखेंगे,कौन है ऊपर? इससे बड़ा दुर्भाग्य क्या हो सकता है कि ऊपर देखने जैसी आत्माएं ही नहीं हैं,जिनकी तरफ देखकर प्राण धिक्कारने लगे,अपने को कि यह प्रकाश तो मैं भी हो सकता था,ये फूल तो मेरे भीतर भी खिल सकते थे। यह गीत तो मैं भी गा सकता था। एक बार यह खयाल आ जाए कि मैं भी हो सकता था। यहां लेकिन कोई हो, जिसे देखकर यह खयाल आ जाए तो प्राण ऊपर की यात्रा शुरु कर देते हैं। स्मरण रहे प्राण हमेशा यात्रा करते हैं,अगर ऊपर की नहीं करते हैं तो नीचे की करते हैं। प्राण रुकते कभी नहीं या तो ऊपर जाएंगे या नीचे। रुकना जैसी कोई चीज नहीं है। ठहराव जैसी कोई चीज नहीं है,स्टेशन जैसी कोई जगह चेतना के जगत में नहीं है,जहां आप रुक जाएं और विश्राम कर लें। जीवन प्रति क्षण गतिमान है। ऊपर की तरफ चेतनाएं खड़ी करनी हैं।

मैं सारी दुनिया में एक आंदोलन चाहता हूँ। बहुत ज्यादा लोगों का नहीं,थोड़े से हिम्मतवर लोगों का,जो प्रयोग करने को राजी हों। अगर सौ आदमी हिंदुस्तान में प्रयोग करने को राजी हो और तय कर लें इस बात को कि हम आत्मा को उन ऊँचाइयों तक ले जाएंगे जहां आदमी का जाना संभव है। 20 वर्ष में हिंदुस्तान की शकल बदल सकती है। विवेकानंद ने मरते वक्त कहा था कि मैं पुकारता रहा सौ लोगों को,लेकिन वे सौ लोग नहीं आए और मैं हारा हुआ मर रहा हूँ। सिर्फ सौ लोग आ जाते तो मैं देश को बदल देता। विवेकानंद पुकारते रहे,सौ लोग नहीं आए। मैंने तय किया है कि मैं पुकारुंगा नहीं,गांव-गांव खोजूंगा,आंख-आंख में झांकूंगा कि वह कौन आदमी है। अगर पुकारने से नहीं आएगा तो तो खींचकर लाना पड़ेगा। सौ लोगों को भी लाया जा सके तो यह मैं आप लोगों को विश्वास दिलाता हूं कि उन सौ लोगों की उठती हुई आत्माएं एक एवरेस्ट की तरह,एक गौरीशंकर की तरह खड़ी हो जाएंगी। पूरे मूल्क के प्राण उस यात्रा पर आगे बढ़ सकते हैं।

जिन मित्रों को मेरी चुनौती ठीक लगती हो और जिनको साहस और बल मालूम पड़ता हो उस रास्ते पर जाने का जो बहुत अपरिचित है,उस रास्ते पर,उस समुद्र में,जिसका कोई नक्शा नहीं है हमारे पास। तो उसे समझ लेना चाहिए कि उसमें हिम्मत और साहस सिर्फ इसलिए है कि बहुत गहरे में परमात्मा ने उसको पुकारा होगा,नहीं तो इतना साहस और इतनी हिम्मत नहीं हो सकती थी। मिश्र में कहा जाता था कि जब कोई परमात्मा को पुकारता है तो उसे जान लेना चाहिए कि उससे बहुत पहले परमात्मा ने उसे पुकार लिया होगा अन्यथा पुकार ही पैदा नहीं होती। जिनके भीतर भी पुकार है,उनके ऊपर एक बड़ा दायित्व है। आज तो जगत के कोने-कोने में जाकर कहने की बात है कि कुछ थोड़े से लोग बाहर निकल आवें और सारे जीवन को ऊँचाइयां अनुभव करने के लिए समर्पित कर दें। जीवन के सारे सत्य,जीवन के आज तक के सारे अनुभव असत्य हुए जा रहें हैं। जीवन की आज तक की जितनी ऊँचाइयां थीं,जो छूई गई थीं,वे काल्पनिक हुई जा रही हैं,पुराण कथाएं हुई जा रही हैं। सौ-दो-सौ वर्ष बाद बच्चे इनकार कर देंगे कि बुद्ध और महावीर और क्राइस्ट जैसे लोग हुए थे,ये सब कहानियां हैं। एक आदमी ने तो पश्चिम में एक किताब लिखी है और उसने लिखा है कि क्राइस्ट जैसा आदमी कभी नहीं हुआ है। यह सिर्फ एक पुराना नाटक है। धीरे-धीरे लोग भूल गए कि ड्रामा है और लोग समझने लगे कि इतिहास है। अभी हम रामलीला खेलते हैं। हम समझते हैं कि राम कभी हुए और इसलिए रामलीला खेलते हैं। सौ वर्ष बाद बच्चे कहेंगे कि रामलीला लिखी जाती रही और लोगों में भ्रम पैदा हो गया कि राम कभी हुए। रामलीला एक नाटक रहा होगा। बहुत दिनों से चलता रहा क्योंकि जब हमारे सामने राम और बुद्ध और क्राइस्ट जैसे आदमी दिखाई पड़ने बंद हो जाएंगे तब हम कैसे विश्वास कर लेंगे कि ये लोग कभी हुए।

फिर आदमी का मन यह मानने को राजी नहीं होता कि उससे ऊँचे आदमी भी हो सकते हैं। आदमी का मन यह मानने को कभी भी राजी नहीं होता कि मुझसे ऊँचा भी कोई है। हमेशा उसके मन में यह मानने की इच्छा होती है कि मैं सबसे ऊँचा आदमी हूँ। अपने से ऊँचे आदमी को तो बहुत मजबूरी में मानता है,नहीं तो कभी मानता ही नहीं है। हजार कोशिश करता है खोजने की कि कोई भूल मिल जाए,कोई खामी मिल जाए,तो बता दूं कि वह आदमी भी नीचा है। तृप्त हो जाऊं कि नहीं यह बात गलत थी। कोई पता चल जाए तो जल्दी से घोषणा कर दूं कि पुरानी मूर्ति खंडित हो गई,वह पुरानी मूर्ति अब मेरे मन में नहीं रही,क्योंकि इस आदमी में यह गलती मिल गई। खोज इसी की चलती थी कि कोई गलती मिल जाए। नहीं मिल पाए तो ईजाद कर लो ताकि तुम निश्चिंत हो जाओ अपनी मूढ़ता में और तुम्हें लगे कि मैं बिल्कुल ठीक हूँ। 

आदमी धीरे-धीरे सबको इनकार कर देगा। क्योंकि उनके प्रतीक,उनके चिह्न कहीं भी दिखाई नहीं पड़ते। पत्थर की मूर्तियां कब तक बताएंगी कि बुद्ध हुए थे और महावीर हुए थे और कागज पर लिखे गए शब्द कब तक समझाएंगे कि क्राइस्ट हुए थे और कब तक तुम्हारी गीता बता पाएगी कि कृष्ण थे। नहीं,ज्यादा दिन नहीं चलेगा। हमें आदमी चाहिए जीसस जैसे,कृष्ण जैसे,बुद्ध जैसे,महावीर जैसे। अगर हम वैसे आदमी आने वाले पचास वर्षों में पैदा नहीं करते हैं तो मनुष्य जाति एक अत्यंत अंधकारपूर्ण युग में प्रविष्ट होने को है। उसका कोई भविष्य नहीं है। जिन लोगों को भी लगता है कि जीवन के लिए कुछ कर सकते हैं,उनके लिए एक बड़ी चुनौती है और मैं तो गांव-गांव यह चुनौती देते हुए घूंमूंगा और जहां भी मुझे कोई आंखें मिल जाएंगी,लगेगा कि ये प्रकाश बन सकती हैं,इनमें ज्योति जल सकती है तो मैं अपना पूरा श्रम करने को तैयार हूँ। मेरी तरफ से पूरी तैयारी है। देखना है कि मरते वक्त मैं भी यह न कहूँ कि सौ आदमियों को खोजता था,वे मुझे नहीं मिले। 

(ओशो का वर्ष 1967ई. में दिया गया एक प्रवचनांश)  

6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय ओशो के प्रवचनों की यही विशेषता है कि वे किसी भी काल में बासी नहीं होते. गहरी से गहरी बात को भी इतनी सरलता और सहजता से वो कहते हैं कि हर किसी के लिए ग्राह्य हो जाता है.. इस प्रवंचन में जो बात कही है, विश्वास नहीं होता कि यह १९६७ अर्थात आज से साढ़े चार दशक पूर्व कही गयी बात है.. लगता है जैसे कल की बात हो!! नमन प्रिय ओशो!!

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  2. ओशो का आह्वान हमेशा प्रेरित करता है।

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  3. ओशो की दृष्टि इतनी व्यापक है कि उन्हें युगपुरुष कहना पड़ता है. पता नहीं उन्हें सौ व्यक्ति मिले या नहीं परंतु उनका कार्य मानवों को प्रभावित करता रहेगा.

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    1. भारत भूषण जी, ओशो ने एक बगिया तैयार की है,जिसमें अनेकों तरह के फूल अपनी खुश्बू से इस विश्व के कोने-कोने में शुभ संदेश प्रसारित कर रहें हैं और मनुष्य से संकीर्णता की रेखाएं मिट रहीं हैं...धीरे-धीरे ओशो का दर्शन फलीभूत होता जा रहा है।

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  4. बहुत सुंदर आख्यान...आभार ! ओशो को नमन !

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