मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

संत रैदास



संतों में ध्रुव तारा : संत रैदास 

संत रैदास मध्यकाल के प्रमुख संत हैं। ओशो संत रैदास के संबंध में कहते हैं, भारत का आकाश संतों के सितारों से भरा है। अनंत-अनंत सितारे हैं,यद्यपि ज्योति सबकी एक है। संत रैदास उन सब सितारों में ध्रुवतारा हैं- इसलिए कि शूद्र के घर पैदा होकर भी काशी के पंडितों को मजबूर कर दिया स्वीकार करने को। महावीर का उल्लेख नहीं किया ब्राह्मणों ने अपने शास्त्रों में। बुद्ध की जड़ें काट डाली,बुद्ध के विचार को उखाड़ फेंका। लेकिन रैदास में कुछ बात है कि रैदास को नहीं उखाड़ सके और रैदास को स्वीकार करना पड़ा।

निश्चित ही रैदास भारत के आध्यात्मिक आकाश में ध्रुवतारे की भांति हैं। क्योंकि चमार के घर में पैदा होकर भी,सब अभावों और असुविधाओं के होते हुए भी वे उस ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर सके, उस ब्रह्म के साक्षात्कार कर सके जिसके लिए मानव जन्मों-जन्मों से प्यासा है।

संत रैदास के गुरु रामानंद हैं। संत कबीर रैदास के गुरुभाई हैं। कबीर और रैदास दोनों के गुरु रामानंद हैं और मीरा जैसी परम अनुभूति को प्राप्त अद्भुत नारी संत रैदास की शिष्या हैं। रैदास का मार्ग भक्ति का है,प्रेम का है। उनका राम भी दशरथ पुत्र राम नहीं है बल्कि निर्गुण,निराकार परब्रह्म है। वे प्रेम के मार्ग से मुक्ति तक पहुंचे। स्वयं आजीवन गृहस्थी रहे। गृहस्थ होकर प्रेम की साधना करते रहे और मन के पार की उस परम चैतन्य गंगा में स्नान के भागी बने जहां सब साधनाएं छूट जाती हैं और व्यक्ति परम चेतना में स्थित हो जाता है।

अभिव्यक्ति के लिए उन्होंने सरल व्यवहारिक ब्रजभाषा को अपनाया है,जिसमें अवधी,राजस्थानी,खड़ीबोली और उर्दू-फारसी के शब्दों का मिश्रण है। उपमा तथा रूपक अलंकार उसमें सहज ही आ गए हैं। उनकी भक्ति का एक पद प्रस्तुत है- 

अब कैसे छूटै राम, नाम रट लागी।
प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,जाकी अंग अंग बास समानी।
प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चन्द चकोरा।
प्रभु जी तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती।
प्रभु जी तुम मोती हम धागा,जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा,ऐसी भक्ति करै रैदासा।


9 टिप्‍पणियां:

  1. बिटिया के साहित्य की पुस्तक में संत रैदास की यह रचना सम्मिलित की गयी है.. जब उसे पढाने बैठा तो अर्थ बताते हुए ही एक अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई... स्वयं को प्रभु के साथ एकाकार करने की अवस्था भक्ति और प्रेम की पराकाष्ठा है. गुरु ग्रन्थ साहिब में भी संत रैदास के पड़ संग्रहीत हैं..
    उस महान संत की जयंती पर श्रद्धा सुमन!!

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    1. कमेंट बॉक्स बंद नहीं किया गया। शायद कोई तकनीकी खराबी की वजह से यह हुआ हो।

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  2. मध्ययुगीन साधकों में संत रैदास का विशिष्ट स्थान है। निम्नवर्ग में समुत्पन्न होकर भी उत्तम जीवन शैली, उत्कृष्ट साधना-पद्धति और उल्लेखनीय आचरण के कारण वे आज भी भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में आदर के साथ याद किए जाते हैं।
    स्वभाव से संत रैदास संत कबीर से भिन्न थे। कबीर में ओज, अक्खड़ता और प्रखरता थी तो संत रैदास में शांति, संयम और विनम्रता। उन्होंने सामाजिक विषमता के प्रति अपना विरोध दर्ज़ किया। उन्होंने वर्णवादी व्यवस्था की असमानता के प्रति आक्रोश अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रकट किया।

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  3. इस छोटे से आलेख में आपने काफी कुछ समेट लिया है. पिछले दिनों नेट पर तकरार देखी है कि कबीर-रविदास किसी भी प्रकार से रामानंद के समकालीन नहीं थे. यह केवल इस लिए किया गया ताकि यह परंपरा बनी रहे कि इनके पास जो कुछ भी था उसके मूल में कहीं कोई ब्राह्मण परंपरा थी. सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्म की परंपरा तो महावीर और बुद्ध से प्रमाणित है जिनके रंग श्याम थे और कि वे ब्राह्मण से उनका कुछ लेना-देना नहीं था.

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    1. आखिरी वाक्य को कृपया इस प्रकार पढ़ें-

      सच तो यह है कि भारतीय अध्यात्म की परंपरा महावीर और बुद्ध से प्रभावित है जिनके रंग श्याम थे और कि किसी ब्राह्मण परंपरा से उनका कुछ लेना-देना नहीं था.

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  4. रविदास जी के भक्ति गीतों एवं दोहों ने भारतीय समाज में समरसता एवं प्रेम भाव उत्पन्न करने का प्रयास किया है । हिन्दू और मुस्लिम में सौहार्द एवं सहिष्णुता उत्पन्न करने हेतु रविदास जी ने अथक प्रयास किए थे और इस तथ्य का प्रमाण उनके गीतों में देखा जा सकता है। वह कहते हैं कि तीर्थ यात्राएँ न भी करो तो भी ईश्वर को अपने हृदय में पा सकते हो.
    " का मथुरा का द्वारिका का काशी हरिद्वार।
    रैदास खोजा दिल आपना तह मिलिया दिलदार।"

    रैदास जी के बारे में अच्छी जानकारी मिली । आपका यह पोस्ट संग्रहणीय है । मेरे पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद ।

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  5. रविदास जी के भक्ति गीतों एवं दोहों ने भारतीय समाज में समरसता एवं प्रेम भाव उत्पन्न करने का प्रयास किया है. हिन्दू और मुसलिम में सौहार्द एवं सहिष्णुता उत्पन्न करने हेतु रविदास जी ने अथक प्रयास किए थे और इस तथ्य का प्रमाण उनके गीतों में देखा जा सकता है. वह कहते हैं कि तीर्थ यात्राएँ न भी करो तो भी ईश्वर को अपने हृदय में वह पा सकते हो.

    का मथुरा का द्वारिका का काशी हरिद्वार।

    रैदास खोजा दिल आपना तह मिलिया दिलदार।

    रैदास जी के बारे में आपकी प्रस्तुति अच्छी लगी । मेरे पोस्ट पर आपका आमंत्रण है ।

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