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स्व का मालिक या शव का मालिक

स्वामी रामतीर्थ टोकियो गए थे। वहां एक बड़े भवन में आग लग गई थी। उस भवन के बाहर हजारों लोग इकट्ठे थे। रामतीर्थ भी खड़े होकर देखने लगे। भवन का मालिक खड़ा था। उसकी आंखें पथरा गई थी। वह देख रहा था,लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं पड़ रहा था। जिंदगी भर जो बनाया था,वह जल रहा था। नौकर-चाकर,आसपास के पड़ोस के मित्र सामान लेकर बाहर आ रहे थे। तिजोरियां निकाली जा रही थी। हीरे-जवाहरात निकाले जा रहे थे। कीमती वस्त्र निकाले जा रहे थे। अमूल्य चीजें थी,उस धनपति के पास। वे सब बाहर निकाली जा रही थी। फिर लोगों ने मालिक से कहा कि एक बार भीतर जाया जा सकता है। अगर कोई जरूरी चीजें रह गई हों,तो हम भीतर से ले आएं। उस आदमी ने कहा-"मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या हो रहा है,क्या आ गया है,क्या छूट गया है? मुझे कुछ भी पता नहीं है। तुम ऐसे ही जा कर देख लो,जो दिखाई पड़े,ले आओ। जिसका सब जल रहा हो उसे क्या दिखाई पड़ सकता है? जिसका सब जल रहा हो,वह क्या हिसाब किताब रख सकता है कि क्या छूट गया,क्या बच गया? ये सब फुरसत की बातें हैं,आराम की बाते हैं। सब जलता हो तो ये सब हिसाब-किताब काम नहीं पड़ते।"

वे लोग भीतर वापिस गए और छाती पीटते हुए बाहर आए। हर बार तो वे खुशी से आते थे कि वे कुछ लेकर आए हैं।  इस बार भी वे कुछ लेकर आए थे,लेकिन रोते हुए। सारी भीड़ इकट्ठी हो गई और पूछने लगी कि रोते क्यों हो? उन्होंने कहा-"बड़ी भूल हो गई। हमारे मालिक का एक ही बेटा था। उस बेटे को हम बचाना भूल गए। वह भीतर सो रहा था। वह जल गया,चल बसा। हम सामान बचाते रहे। सामान तो बच गया,लेकिन मकान का मालिक,होने वाला मालिक जल गया।"

स्वामी रामतीर्थ ने उस दिन अपनी डायरी में लिखा-"यही तो सारी दुनिया में होता है। आदमी मर गया है और सामान बचाया जा रहा है। असली मालिक खो गया है और सामान बच गया । सामान बहुत है,बहुत ढेर है। अम्बार है उसका,लेकिन सामान में खोजने जाओ तो सामान के मालिक का कोई पता नहीं मिलता। मालिक कहां है?"

बैंक-बैलेंस है बहुत,लेकिन किसका है? उसका कोई पता नहीं चलता कि वह कौन है भीतर! जिसकी यह शक्ति है,वह कहां है?
उसका पता शांति में ही चलता है।
उसका पता अशांति में कभी नहीं चलता।
और इस शांति को खोजना है तो भीतर की यात्रा जरुरी है;जहां व्यक्ति का अंतस्तल है;जहां कोई विक्षोभ नहीं।

टिप्पणियाँ

  1. दिल को उद्वेलित करने वाला, मस्तिष्क को झकझोरने वाला प्रेरक प्रसंग!!

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  2. एक बहुत ही सार्थक और विचारोत्तेजक प्रसंग।
    हमे अंदर की यात्रा से ही सच्ची निधि की प्राप्ति होगी।

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