बुधवार, 4 जुलाई 2012

बुद्ध की संगति का लोभ

ऐसी कथा है कि एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शिष्य सारिपुत्र बुद्ध से दूर-दूर बैठता था। जबकि स्वभावतः लोग पास-पास बैठने कि कोशिश करते हैं। सारिपुत्र छिप-छिप कर बैठता था, कहीं झाड़ की आड़ में,कहीं भीड़ की आड़ में। और दस हजार शिष्यों में बहुत आसान था छिप- छिप कर बैठ जाना। एक दिन आखिर बुद्ध ने उसे पकड़ ही लिया और कहा कि सारिपुत्र,यह तुम क्या कर रहे हो? सारिपुत्र ने कहा ,मुझे छोड़ दो, मुझे छिपा रहने दो। पर बुद्ध ने कहा,मामला क्या है?

सारिपुत्र ने कहा कि मै बुद्धत्व को उपलब्ध नहीं होना चाहता। बुद्ध ने कहा,तुम पागल हो गए हो? तुम मेरे पास आए इसलिए थे कि बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाओ। उसने कहा,आया था वह मेरी गलती थी। जाने वाला नहीं हूँ; क्योंकि मै देखता हूँ रोज-रोज जो जो बुद्धत्व को उपलब्ध हो जाते हैं उनसे आप कहते हैं,जाओ, अब मेरे सन्देश को दूर दूर पहुंचाओ। मै तो रोज-रोज डुबकी लूँगा,मै बुद्धत्व छोड़ सकता हूँ; लेकिन आपमें डुबकी लेना नहीं छोड़ सकता हूँ। अगर वचन देते हों कि मेरे बुद्धत्व के बाद भी मुझे इन चरणों में बैठने का हक़ होगा तो मै छिपना छोड़ दूँ। अन्यथा मै छिपता रहूँगा,अन्यथा मै बचता रहूँगा। मैं बहुत बार बुद्धत्व के किनारे पहुँच गया हूँ और ऐसा भागा हूँ कि मैंने पीछे लौटकर नहीं देखा। मुझे पक्का पता है कि मंदिर कहाँ है। उसी मंदिर की ओर से बच-बच कर चल रहा हूँ। मुझे मत सताओ।


बुद्ध ने तब उसे वचन दिया कि तू फ़िक्र छोड़। तू भी खूब आदमी है। तू मज़े से बैठ,जहाँ तुझे बैठना है। तेरे बुद्धत्व के बाद भी तू मेरे साथ ही चलेगा। तुझे मैं अपनी छाया की तरह साथ रखूँगा। सारिपुत्र ने कहा,आश्वासन? कोई धोखाधड़ी तो नहीं है? लेकिन उसे पक्का विश्वास नहीं आया।

वह बुद्ध के पास बैठने लगा,और एक दिन बुद्धत्व को उपलब्द्ध भी हुआ लेकिन उसने बुद्ध से निवेदन नहीं किया कि मैंने उसे पा लिया है जिसे खोजने निकला था। बुद्ध ने कहा,सारिपुत्र!!! कम से कम कह तो दे। सारिपुत्र ने कहा,मै अपने मुंह से न कहूँगा। मुझे अज्ञानी ही रहने दो।बुद्ध ने कहा,मगर तू अब अज्ञानी नहीं है,तू बुद्ध हो गया है.और वे बातें जो मैंने तुझसे कहीं थीं ,तेरे अज्ञान में कहीं थीं। उसने कहा,देख रहे हैं,मैंने पहले ही कहा था,धोखाधड़ी नहीं चलेगी। मैं मर जाऊं मगर इस जगह को नहीं छोडूंगा।यह डुबकी, इसके बिना बुद्धत्व भी मुझे मीठा नहीं है। 

10 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो आपके सत्संग का लाभ उठा रहे हैं।

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  2. :) प्रेम भक्ति के लिए तो कहानी बहुत प्यारी है - परन्तु बुद्धत्व के लिए ? प्रश्न उठते हैं मन में ( हम तो बुद्ध नहीं हुए अब तक, इसलिए उठते हैं शायद )

    मीरा किसी बुद्धत्व के लिए अपने कान्हा को न छोड़ेगी - हाँ | परन्तु बुद्ध ? यदि वे बुद्धत्व को उपलब्ध हो गए थे सचमुच, तो बुद्ध में लगाई डुबकी का इतना मोह रह जाता क्या ? हनुमान वायु हैं, राम आकाश, सो बुद्धत्व के बाद भी वे राम से पृथक नहीं होंगे - कभी भी नहीं | परन्तु वे बहेंगे अवश्य, राम के "पास" बैठ "डुबकी" लेने के लिए वे बहने से रुक जायेंगे क्या कभी ?

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  3. ज्ञान और भक्ति के अंतर स्पष्ट करती पोस्ट ।
    परन्तु मेरे हिसाब से गुरु का कार्य गुरु के सानिध्य से बढ़के व प्रीतिकर है और वैसे भी बुद्धत्व को प्राप्त हुए व्यक्ति के लिए बुद्ध कहाँ नहीं हैं ।

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  4. यह सत्संग की महिमा का वर्णन है. चाहे वह बाहर के बुद्ध का सत्संग हो या भीतर के बुद्ध का सत्संग हो, उसका संग ज़रूरी है.

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  5. सर्वथा नवीन आख्यान.. मनोज जी, आपके सान्निध्य में बहुत कुछ पाया है.. और मैं सारिपुत्र की मनःस्थिति समझ सकता हूँ!! बहुत ही सुन्दर!!

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