सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

गुड्डो

(किशोर युवती के मन को संजोती एक प्यारी सी,मासूम सी कहानी--गुड्डो, गुलज़ार की लिखी यह कहानी पढ़ने लायक है) 

कई बार उसे खुद भी ऐसा लगा कि वो अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी हो गयी है। जब वो आठवीं में थी दसवीं जमात की लड़कियों की तरह बात करती थी। और नवीं में आने के बाद तो उसे ऐसा लगा जैसे बिल्कुल बड़ी दीदी की तरह कॉलेज में पढ़ने लग गयी है। उन्हीं की तरह उसने अपनी डायरी लिखनी शुरु कर दी थी। उन्हीं की तरह वो भी मूडी हो गयी थी। उन्हीं की तरह घंटों शीशे के सामने बैठी सिंगार करती रहती। गयी बार माँ ने टोका तो उसे बुरा लगा।

"हुँह! दीदी को तो कुछ कह नहीं सकती,मुझे डाँट देती हैं।"
मन ही मन बड़बड़ाकर वो चुप हो गयी।
लेकिन उस दिन वो फूट पड़ी जिस दिन दीदी ने उसके लिए नया फॅराक बनाया।
"मैं नहीं पहनती फॅराक। खुद तो अच्छी अच्छी साड़ियाँ ले आती हैं। मेरे लिए ये फॅराक बना दिया है।"
"गुड्डो-तू बड़ी हो जाए तो..."
"गुड्डो,गुड्डो मत कहा करो मुझे। यह मेरा नाम नहीं है।"
"अच्छा कुसुम जी आप बड़ी हो जाएँगी तो साड़ी भी ला देंगे।"
"मैं अभी छोटी हूँ? नवीं में पढ़ती हूँ।"
दीदी हँस पड़ी और वो पैर पटखती चली गयी।

दीदी,पता नहीं,अपने-आपको किस बात पर बड़ा समझती हैं। वो उनसे ज्यादा अच्छी डायरी लिख लेती है। उनसे ज़्यादा प्यार भरी बातें कह सकती है। देवराज की तो शकल भी अच्छी नहीं है। ऐसी ऊँची नाक है। हाथ से पसीना पोंछता है तो हाथ टकरा जातें हैं। और वो खुद! वो जिसे प्यार करती है वो तो लाखों का चहेता है। सचमुच फि़ल्मों का हीरो। देवराज तो उसके 'मेहबूब' की नकल करता है। वो जैसे बाल बनाता है,देवराज भी वैसे बाल बनाता है। पल-भर को उसे लगा जैसे दीदी भी कुछ नहीं। जैसे देवराज और दीदी तो बस दिलीप कुमार और कुसुम की जूठन हैं। इस ख़याल से उसे बड़ी तसल्ली हुई। ख़यालों ही ख़यालों में दिलीप की आग़ोश में डूब गयी और आसमान पर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े जोड़ने लगी।

कितनी बार वो स्कूल से भाग-भाग कर अपने 'मेहबूब' से मिलने गयी थी। सातवीं में थी। सातवीं या आठवीं में जब उसने 'मधुमती' देखी थी। हाय! कितना अच्छा लगता था उसमें दिलीप। पूरी बांहों वाली जर्सी में,बस इसके होंटों से 'सी' निकल गयी। उसका बस चलता तो वहीं भाग कर पर्दे पर उसका हाथ पकड़ लेती। उसने कभी सोचा था,वो दिलीप से मिलेगी,तो जरूर एक पूरी बाँहों वाली जर्सी बुन कर देगी। और फिर 'नया दौर' में जब उसने दिलीप को धोती में देखा तो उसकी रही-सही सुध-बुध भी जाती रही। उस दिन से तो वह उसपर बिल्कुल ही लट्टू हो गयी थी। ताँगे की कमानी पर बैठ कर जब हवा में चाबुक लहराता था तो जैसे जान ही निकाल लेता था। उसे हर वक़्त यही डर लगा रहता था,कहीं गिर न पड़े। कई बार तो टाँगों के धचके के साथ वो खुद भी उछल पड़ी थी। और जब दिलीप दनदनाता हुआ टूटे हुए पुल से गुज़रा था तो उसने पुल के नीचे अपनी दोनों बाँहों का पूरा ज़ोर लगा दिया था। उसे तो तब एहसास हुआ था जब साथ की सीट पर बैठी उसकी सहेली ने 'उई' कह के अपना हाथ छुड़ाया था। लेकिन ये मोटी मद्रासिन वैजयंतीमाला क्यों इसके पीछे पड़ गयी है। यकलख़्त ही वैजयंतीमाला के ख़ेलाफ़ शदीद नफ़रत से भर गयी। धन्नो! आयी बड़ी धन्नो! उसे बड़ी तसल्ली हुई यह सोचकर कि 'गंगा जमुना' के आख़िर में वैजयंती माला मर जाती है।

वो बिस्तर से उठी और जाकर मेज़ के दराज़ से अपनी डायरी निकाली। डायरी में 'गंगा जमुना' की बुकलेट पड़ी थी। बुकलेट के ऊपर दिलीप और वैजयंती की तस्वीर थी। उसने दीदी की अलमारी से कैंची निकाली और वैजयंती की तस्वीर काट कर अलग कर दी। दिलीप की तस्वीर को चूमा। उसके बालों पर हाथ फेरा और फिर तस्वीर को सँभाल कर डायरी में रखा और डायरी पर सर रखके फिर बिखरे-बिखरे बादलों के टुकड़े चुनने लगी।

कब से वो इन बादलों के टुकड़े सी रही थी। लेकिन बादल थे कि बार-बार बिखर जाते थे। न बरसते थे,न सिलने में आते थे। कहाँ तक वो बादलों को जोड़ती जाए,पिरोती जाए,काश! वो एक बार जमके बरस जाएँ ताकि उसका कलेजा ठंडा हो जाए। 

काश!दिलीप एक बार मुझे चिट्ठी लिखें। उसने सोचा। जैसे देवराज दीदी को लिखता है। वो तो कुछ भी नहीं। दिलीप जो लिखेगा,वो तो कोई और लिख भी नहीं सकता। उसने कई बार उसके लिखे हुए ख़त फ़िल्मों में सुने थे। 

उसने डायरी निकाली और दिलीप के नाम एक और ख़त लिखने बैठ गयी। 

नवीं का इम्तेहान दिया ही था कि कुसुम की ज़िन्दगी में एक ऐसी सुबह आयी जिसका वो तसव्वुर भी नहीं कर सकती थी। सुबह उठते ही मालूम हुआ,मामा आये हैं और सब दिलीप की शूटिंग देखने चलेंगे। स्कूल में छुट्टी थी। बस,बात बन गयी। वो भी जाएगी। उसने मामा से कह दिया।

"चलो तुम भी चलो।"
"यह क्या करेगी जाकर?" दीदी ने कहा।
"गुड्डो ऑटोग्राफ़ ले लेगी।"
"इसे गुड्डो मत कहिए मामा जी,वरना नाराज़ हो जाएगी। अब यह बड़ी हो गयी है।"
दीदी हँस रही थी। वो फिर दीदी से चिढ़ गयी। जब दिलीप प्यार भरी नज़रों से उसकी तरफ़ देखेगा,तब पता चलेगा,वो कितनी बड़ी हो गयी है। वो तैयार होने अंदर चली गयी और देर तक सिंगार की मेज़ के सामने बैठी रही।

जब शूटिंग पर पहुँचे तो दिलीप और वैजयंती एक 'सीन' की रिहर्सल कर रहे थे। सहमी-सहमी- सी वो एक तरफ़ खड़ी रही दिलीप वैजयंती का हाथ पकड़े कह रहा था--
"लता,अब दुनिया की कोई ताक़त तुम्हें मुझसे छीन नहीं सकती। मैंने हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हें पा लिया है। बताओ,मेरे साथ चलोगी लता?"
और लता ने बड़े प्यार से अपना सिर दिलीप के सीने पर रख दिया।
"बेशरम" कुसुम मन ही मन बुड़बुड़ाई।
शॉट खत्म हुआ तो मामा ने कहा,"गुड्डो,जाओ ले लो ऑटोग्राफ?"
"नहीं नहीं मुझे नहीं लेना ऑटोग्राफ़।" वो रुआँसी हो कर बोली।
"अरे क्या हो गया?"
"कुछ नहीं।" वो कह कर बाहर चली गयी।
जब सब वापस आ गये तो वो सीधी अपने कमरे में पहुँची दराज़ से डायरी निकाली और डायरी से दिलीप के सारे फोटो निकाले और मसल-कुचल कर खिड़की से बाहर फेंक दिए।
"जाओ,जाओ,अपनी धन्नों के पास! तुम भी जाओ।"
और बिस्तर पर गिर कर फूट-फूट कर रोने लगी।

टिप्पणियाँ

  1. लघुकथा लिखना भी एक शानदार विधा है. इस विधा में भी गुलज़ार साहब को महारत हासिल है. उनकी अधिकांश फ़िल्में मूलतः लघुकथाओं पर ही आधारित रही हैं.. और एक-दो पन्नों की कहानी पर तीन घंटे की मनोरंजक फिल्म बनाना बस इनके ही बस की बात है..
    फिल्म 'गुड्डी' भी इसी कहानी पर आधारित एक फिल्म है.. और क्या फिल्म है!!! मनोज जी इस लघुकथा को यहाँ प्रस्तुत करके आपने मेरा दिल जीत लिया है!! आभार, धन्यवाद, शुक्रिया!!

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. क्या 'गुड्डी फिल्म इस कहानी पर ही बनी है , लेकिन फिल्म में तो कहानी और भी आगे जाती है ।

      हटाएं
    2. अंशुमाला जी! वही बात मैंने कही है कि लघु-कथाओं पर बनी फिल्मों में विस्तार होता है और कई बार फिल्म कहानी से अलग जाकर कुछ कहती है.. आर. के. नारायण के उपन्यास "गाइड" पर बनी फिल्म, भले ही बहुत सफल फिल्म हो मगर स्वयं आर. के. नारायण उससे संतुष्ट नहीं थे. फिल्म चित्रलेखा और ऐसी कई फ़िल्में.. वैसे गुड्डी और गुड्डो दोनों के कथाकार गुलज़ार हैं, इसलिए फिल्म के हिसाब से कहानी में परिवर्तन किया गया होगा.
      इसी बात पर मनोज जी से मैं कह भी रहा था कि मुझे इस कहानी का अंत ज़्यादा अच्छा लगा!!

      हटाएं
  2. सच में यह कहानी पढ़ने लायक है। बाक़ी बातों का पता सलिल भाई की टिप्पणी से चला।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बालपन और युवावस्था के बीच खड़ी लड़की के अनुराग पर पड़ी चोट की सुंदर कहानी यहाँ लाने के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं…

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए ।
राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा…

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
0
0
0
होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा