संदेश

ओशो की डायरी से:5:

यह सत्य है कि मनुष्य अब पशु नहीं है;लेकिन क्या यह भी सत्य है कि मनुष्य,मनुष्य हो गया है? पशु होना अतीत की घटना हो गई है पर मनुष्य होना अभी भी भविष्य की संभावना है।शायद हम मध्य में हैं और यही हमारी पीड़ा है,यही हमारा तनाव है,यही हमारा संताप है। जो प्रयास करते हैं और स्वयं के इस पीड़ा-अस्तित्व से असंतुष्ट होते हैं,वे ही मनुष्य हो पाते हैं।मनुष्यता मिली हुई नहीं है,उसे हमें स्वयं ही स्वयं में जन्म देना होता है। लेकिन मनुष्य होने के लिए यह आवश्यक है कि हम पशु न होने को ही मनुष्य होना न समझ लें और जो हैं उससे तुष्ट न हो जावें। स्वयं से गहरा और तीव्र असंतोष ही विकास बनता है। मैं तथाकथित शिक्षा से कितना पीड़ित हुआ हूं,कैसे बताऊं? सिखाया हुआ ज्ञान,विचार की शक्ति को तो नष्ट ही कर देता है। विचारों की भीड़ में विचार की शक्ति तो दब ही जाती है। स्मृति प्रशिक्षित हो जाती है और ज्ञान के स्रोत अविकसित ही रह जाते हैं। फिर यह प्रशिक्षित स्मृति ही ज्ञान का भ्रम देने लगती है। इस तथाकथित शिक्षा में शिक्षित व्यक्ति को नए सिरे से ही विचार करना सीखना होता है। उसे फिर से अशिक्षित होना पड़ता है। यही मुझे भी कर...

ओशो की डायरी से :4:

समाधि में क्या जाना जाता है? कुछ भी नहीं। जहां तक जानने को कुछ भी शेष है,वहां समाधि नहीं है। समाधि सत्ता के साथ एकता है- जानने जितनी भी दूरी वहां नहीं है। संसार में संसार के होकर न रहना संन्यास है। पर बहुत बार संन्यास का अर्थ उन तीन बंदरों की भांति लगा लिया जाता है जो कि बुरे दृश्यों से बचने के लिए आंख बंद किए हैं और बुरी ध्वनियों से बचने के लिए कान और बुरी वाणी से बचने के लिए मुख। बंदरों के लिए तो यह क्षम्य है लेकिन मनुष्यों के लिए अत्यंत हास्यास्पद। भय के कारण संसार से पलायन मुक्ति नहीं वरन् एक अत्यंत सूक्ष्म और गहरा बंधन है। संसार से भागना नहीं,स्वयं के प्रति जागना है। भागने में भय है, जागने में अभय की उपलब्धि। ज्ञान से प्राप्त अभय के अतिरिक्त और कुछ भी मुक्त नहीं करता।  क्या निर्वाण और मोक्ष भी चाहा जा सकता है? निर्वाण को चाहने से अधिक असंगत बात और कोई नहीं है, क्योंकि जहां कोई चाह नहीं है, वहीं निर्वाण है। चाह ही अमुक्ति है तो मोक्ष कैसे चाहा जा सकता है? किंतु मोक्ष को चाहने वाले व्यक्ति भी हैं और तब स्वाभाविक ही है कि उनका तथाकथित संन्यास भी बंधन का एक रूप हो और संसार का ह...

ओशो की डायरी से :3:

मैं खोजता था तो मौन से बड़ा कोई शास्त्र नहीं पा सका। और शास्त्र खोजे तो पाया कि शास्त्र व्यर्थ हैं, और मौन ही सार्थक है। कहां जा रहे हो? जिसे खोजते हो,वह दूर नहीं निकट है।और जो निकट है,उसे पाने को यदि यात्रा की तो उसके पास नहीं,उसके दूर ही निकल जाओगे। ठहरो और देखो। निकट को पाने के लिए ठहरकर देखना ही पर्याप्त है।  मुक्ति न तो प्रार्थना से पाई जाती है,न पूजा से, न धर्म-सिद्धांतों में विश्वास से। मुक्ति तो पाई जाती है अमूर्च्छित जीवन से। इसलिए मैं कहता हूँ कि प्रत्येक विचार और प्रत्येक कर्म में अमूर्च्छित होना ही प्रार्थना है,पूजा है और साधना है। उसे सोचो जिसे कि तुम सोच ही नहीं सकते हो और तुम सोचने के बाहर हो जाओगे।सोचने के बाहर हो जाना ही स्वयं में आ जाना है। जीवन के विरोध में निर्वाण मत खोजो।वरन जीवन को ही निर्वाण बनाने में लग जाओ। जो जानते हैं वे यही करते हैं। डो-झेन के प्यारे शब्द हैं- "मोक्ष के लिए कर्म मत करो,बल्कि समस्त कर्मों को ही मौका दो कि वे मुक्तिदायी बन जाएं।" यह हो जाता है, ऐसा मैं अपने अनुभव से कहता हूँ। और जिस दिन यह संभव होता है,उस दिन जीवन एक पूरे खिले ह...

ओशो की डायरी से :2:

यह मत कहो कि मैं प्रार्थना में था,क्योंकि उसका अर्थ है कि आप प्रार्थना के बाहर भी होते हो। जो प्रार्थना के बाहर भी होता है,वह प्रार्थना में नहीं हो सकता। प्रार्थना क्रिया नहीं है। प्रार्थना तो प्रेम की परिपूर्णता है। जीवन की खोज में आत्मतुष्टि से घातक और कुछ नहीं। जो स्वयं से संतुष्ट हैं,वे एक अर्थ में जीवित ही नहीं हैं। स्वयं से जो असंतुष्ट है,वही सत्य की दिशा में गति करता है। स्मरण रखना कि आत्मतुष्टि से निरंतर ही विद्रोह में होना धार्मिक होना है। मृत्यु से घबड़ाकर तो आपने ईश्वर का आविष्कार नहीं कर लिया है? भय पर आधारित ईश्वर से असत्य  और कुछ भी नहीं है। जो सदा वर्तमान है,वही सत्य है। निकटतम जो है,वही अंतिम सत्य है। दूर को नहीं,निकट को जानों क्योंकि जो निकट को ही नहीं जानता है, वह दूर को कैसे जानेगा? और जो निकट को जान लेता है,उनके लिए दूर शेष नहीं रह जाता है। मैं कौन हूँ?  पूछो- स्वयं से। मैं कहां हूँ? खोजो- स्वयं में।जब तुम कहीं भी स्वयं को नहीं पा सकोगे तो जान जावोगे कि तुम कौन हो। मैं की अनुपलब्धि में ही मैं का रहस्य छिपा हुआ है। सत्य यदि ज्ञात नहीं है,तो शास्त्र व्य...

नियति का सुख

जिंदगी में कुछ चीजें निश्चित सी होती हैं या कहें कि नियति चाहती है कि हम वो करें। स्कूल के दिनों में मेरे संस्कृत के अध्यापक ने मेरी अच्छी लिखावट को देख कर मुझे एक कार्य नियमित रूप से करने को कहा। हमारे स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बोर्ड था,जिस पर रोज एक सुविचार लिखा जाता था। इस कार्य के लिए मुझे चुना गया। यह कार्य करते हुए मुझे भी अच्छा लगता था। क्योंकि मैं अखबार,पत्रिकाओं में छपने वाले महापुरुषों के अनमोल विचारों को सदा पढ़ता और उनका संग्रह अपनी नोट बुक में करता।मुझे नहीं मालूम की मेरे इस गुण को मेरे वह अध्यापक समझते थे या नहीं।   आज वर्षों बाद भी, मैं जिस संस्थान में कार्य कर रहा हूँ, वहाँ भी मुख्य द्वार पर 'आज का सुविचार' बोर्ड लगा है। और उस पर विचार लिखने का कार्य मेरा ही है। फर्क सिर्फ इतना है कि स्कूल के बोर्ड पर मैं जो विचार लिखता था, वह 'ब्लैक बोर्ड' पर 'खड़िया मिट्टी' से लिखता था और आज 'वाइट-बोर्ड'पर 'मार्कर पैन'से लिखता हूँ।' इस कार्य को करते समय अनेक अनुभव हुए हैं। कभी विचार लिखे जाने के समय कोई कर्मचारी आकर सुविचार की तारीफ करने...

पवित्र छाया

एक सूफी कहानी : ओशो मुख से एक बार की बात है,एक इतना भला फकीर था कि स्वर्ग से देवदूत यह देखने आते थे कि किस प्रकार से एक व्यक्ति इतना देवतुल्य भी हो सकता है। यह फकीर अपने दैनिक जीवन में, बिना इस बात को जाने,सदगुणों को इस प्रकार से बिखेरता था जैसे सितारे प्रकाश और फूल सुगंध फैलाते हैं। उसके दिन को दो शब्दों में बताया जा सकता था- बांटों और क्षमा करो - फिर भी ये शब्द कभी उसके होंठों पर नहीं आए। वे उसकी सहज मुस्कान,उसकी दयालुता,सहनशीलता और सेवा से अभिव्यक्त होते थे।  देवदूतों ने परमात्मा से कहा: प्रभु,उसे चमत्कार कर पाने की भेंट दें। परमात्मा ने उत्तर दिया, उससे पूछो वह क्या चाहता है?  उन्होंने फकीर से पूछा, क्या आप चाहेंगे कि आपके छूने भर से ही रोगी स्वस्थ हो जाए। नहीं, फकीर ने उत्तर दिया, बल्कि मैं तो चाहूँगा परमात्मा ही इसे करें। क्या आप दोषी आत्माओं को परिवर्तित करना और राह भटके दिलों को सच्चे रास्ते पर लाना पसंद करेंगे? नहीं, यह तो देवदूतों का कार्य है, यह मेरा कार्य नहीं कि किसी को परिवर्तित करुं। क्या आप धैर्य का प्रतिरूप बन कर लोगों को अपने सदगुणों के आलोक से आकर्षित करते...

अथर्ववेद

अंगिरा-वंशीय अथर्वा ऋषि के नाम पर इसका अथर्ववेद  नाम पड़ा।इसके नामकरण के संबंध में गोपथ ब्राह्मण में एक कथा आती है।कथा के अनुसार,ब्रह्मा ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए घोर तपस्या की।तप के प्रभाव से उनके तप:पूत शरीर से तेजस्वरूप दो जल धाराओं का उद्-भव हुआ, जिनमें से एक धारा से अथर्वन तथा दूसरी से अंगिरा उत्पन्न हुए।इन्हीं से अथर्वागिरसों की उत्पत्ति हुई।इनके वंशजों को जो मंत्र दृष्ट हुए उन्हें अथर्ववेद,मृग्वंगिरसवेद अथवा अर्वांगिरसवेद कहा गया। अथर्व का शाब्दिक अर्थ है :गति रहित। थर्व शब्द चंचलता व गति का द्योतक है जबकि अथर्व से गति रहित,निश्चलता,एकाग्रता आदि का तात्पर्य है।इसी लिए कहा गया है : थर्व गति कर्मा न थर्व इति अथर्वा।अथर्व वेद में मानव शरीर के अंगों,शारीरिक रोगों,राजधर्म,समाज-व्यवस्था,अध्यात्मवाद और प्रकृति वर्णन का विस्तृत व व्यवहारिक ज्ञान भरा पड़ा है। अथर्ववेद में वर्णित मंत्र यज्ञ से संबंधित न होकर यज्ञ में उत्पन्न होने वाले विघ्नों के निवारण हेतु यज्ञ संरक्षक ब्रह्म के निमित्त मंत्रों का संग्रह है।इस संहिता में मारण,मोहन,उच्चाटन आदि तंत्र-क्रियाओं का विशेष वर्णन है।इसम...