रविवार, 26 जुलाई 2009

ज्ञान गंगा :2

प्रेम क्या है ? प्रेम उस भाव-दशा का नाम है, जब विश्व सत्ता से पृथकत्व का भाव तिरोहित हो जाता है । समग्र की सत्ता में स्वयं की सत्ता का मिलन ही प्रेम है । यह सत्य है,क्योंकि वस्तुत: सत्ता एक ही है और जो भी है उसमें ही है । यह प्रेम प्रत्येक में सहज ही स्फूर्त होता है, लेकिन अज्ञान के कारण हम उसे राग में परिणत कर लेते हैं । प्रेम की स्फुर्णा को अहंकार पकड़ लेता है और वह स्वयं और समग्र की सत्ता के बीच सम्मिलन न होकर दो व्यक्तियों के बीच सीमित संबंध हो जाता है । असीम होकर जो प्रेम है, सीमित होकर वही राग है । राग बंधन बन जाता है, जबकि प्रेम मुक्ति है । असल में जहां सीमा है, वहीं बंधन है । राग का बुरा होना उसमें निहित प्रेम के कारण नहीं वरन् उस पर आरोपित सीमा के कारण है । राग असीम हो जाए तो वह प्रेम बन जाता है, विराग हो जाता है । ध्यान रखने की बात यही है कि प्रेम तो हो पर उसमें कोई सीमा न हो । जहां सीमा आने लगे वहीं सचेत हो जाना आवश्यक है । वही सीमा संसार है । इस भांति क्रमश: सीमाओं को तोड़ते हुए प्रेम की ऊर्जा का विस्तार ही साधना है । जिस घड़ी उस जगह पर पहुँचना हो जाता है, जहां सीमा नहीं है, तो जानना चाहिए कि परमात्मा पर पहुँचना हो गया । इसके विपरीत्त यदि प्रेम सीमित होता चला जाए और अंतत: अहम् अणु पर ही केद्रित हो जाए, तो जानना चाहिए कि परमात्मा से जितनी ज्यादा पृथकता हो सकती है, वह हो चुकी है । यह अवस्था राग की चरम अवस्था है, जो कि अत्यंत दुख, परतंत्रता और संताप को उत्पन्न करती है । इसके विपरीत्त प्रेम के असीम होने की चित्त दशा है, जो जीवन को अनंत आलोक और आनंद से परिपूरित कर देती है।
( यह लेख ओशो देशना पर आधारित है।)

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