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ज्ञान-गंगा : 5

मनुष्य स्वरूपत: शुभ है या अशुभ ? जो उसे स्वरूपत: अशुभ मान लेते हैं, उनकी दृष्टि अत्यंत निराशाजनक और भ्रांत है । क्योंकि जो स्वरूपत: अशुभ हो, उसके शुभ की संभावना समाप्त हो जाती है । स्वरूप का अर्थ ही यही है कि उसे छोड़ा नहीं जा सकता है । जो सदा अनिवार्य रूप से साथ है वही स्वरूप है । यदि मनुष्य स्वरूप से ही अशुभ हो, तब तो उसे शुभ का विचार भी नहीं उठ सकता । इसलिए हम मनुष्य को स्वरूपत: शुभ मानते हैं । अशुभ आच्छादन है । यह दुर्घटना -मात्र है । जैसे सूर्य अपने ही द्वारा पैदा की हुई बदलियों में छिप जाता है । वैसे ही मनुष्य की चेतना में जो शुभ है, वह उसकी अंतर्निहित स्वतंत्रता के दुरुपयोग से आच्छादित हो जाता है । चेतना स्वरूपत: शुभ और स्वतंत्र है । स्वतंत्रता के कारण ही अशुभ भी चुना जा सकता है । तब एक क्षण को अशुभ आच्छादित कर लेता है । जिस क्षण अशुभ हो रहा है, उसी क्षण वह आच्छादन रहता है । उसके बाद आच्छादन तो नहीं, मात्र स्मृति रह जाती है । शुद्ध वर्तमान में स्मृति शून्य चेतना सदा ही शुभ में प्रतिष्ठित है । अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अपनी शुद्ध वर्तमान सत्ता में शुभ और निर्दोष है । जो व्यक्ति सोचता है कि मुझसे पाप हुआ,उसे भी समझना आवश्यक है कि पाप उसकी अतीत स्मृति है ।क्योंकि जो हो गया है उसका ही सिंहावलोकन चित्त कर पाता है । जो है, यदि चित्त उसके प्रति सजग और जागरुक हो तो चित्त मिट जाता है और मात्र चेतना रह जाती है । यह चेतना नित्य शुभ है । स्मृति और कामना, अतीत और भविष्य यही चेतना के बंधन हैं । इनसे जो मुक्त है, वही स्वरूप में पहुंच जाता है । स्वरूप सदा निर्दोष है ।
यह स्मरणीय है कि मैं स्वरूपत: शुभ हूँ । यह प्रतीत और प्रत्यय कि मैं सदा निर्दोष हूँ, शुभ और निर्दोष जीवन के लिए मुख्य आधार हैं । कोई यह न सोचे कि इस भांति तो अहंता प्रगाढ़ होगी, क्योंकि इस प्रत्यय में मेरी ही नहीं समस्त चेतनाओं की निर्दोषता समाविष्ट है । प्रत्येक चेतना ही अपनी निज सत्ता में शुभ है । यह बोध स्वयं तथा सर्व के लिए सद्भाव उत्पन्न करता है । स्वयं को पापी मानना पाप करने से ज्यादा बुरी बात है । क्योंकि जो निरंतर यह भाव करता है कि मैं पापी हूँ, वह अपने ही भाव में सम्मोहित हो जाता है । कूए ने बड़े ही वैज्ञानिक आधारों पर यह सुप्रतिष्ठित कर दिया है कि हम जो भाव निरंतर करते हैं, क्रमश: हम वैसे ही होते जाते हैं ।बुद्ध ने तो कहा ही है कि विचार ही व्यक्तित्व बन जाता है । विचार और भाव में जो तरंगें उठती हैं, वे ही धीरे-धीरे हमारा व्यवहार बन जाती है । जो स्वयं के पाप,पतित और अपराधी होने के भाव करता रहता है, वह उन्हीं में जकड़ जाता है । फिर जो स्वयं को पापी समझता है, वह शेष लोगों को भी पापी ही समझता है । उसके सोचने के मापदंड वे ही हो जाते हैं। यदि पाप एक सत्य दिखाई पड़ने लगे तो क्रमश: परमात्मा एक असत्य दिखाई पड़ने लगता है । पाप से ऊपर उठने की संभावना ही परमात्मा के होने का प्रमाण है । उस संभावना से ही जीवन के अंधकार में आलोक की किरण फूटती है ।
यह भी स्मरणीय है कि पाप के ऊपर हम तभी उठ सकते हैं कि हमारे भीतर निरंतर ही पाप के ऊपर कुछ हो । अर्थात यदि हमारी चेतना में पाप से अस्पर्शित कुछ भी नहीं है,फिर तो पाप से बाहर जाने का कोई उपाय ही नहीं रह जाता । फिर तो पाप के ऊपर जाना वैसे ही असंभव है, जैसे स्वयं के जूते के बंधों को पकड़ कर स्वयं को उठाने का प्रयास । और यदि चेतना सर्वांशत: पाप हो जाए, तो उसे पाप का बोध भी नहीं रह जाएगा । जिसे पाप का बोध होता है, वह निरंतर पाप के बाहर है । वह बोध ही हमारी शक्ति, सुरक्षा और परमात्मा तक पहुँचने का आश्वासन है । पाप आते हैं और चले जाते हैं । पुण्य भी आते हैं और चले जाते हैं । पाप भी कम हैं, पुण्य भी कम हैं । किंतु जिस पर वे आते हैं, वह निरंतर ही बना रहता है । वह यदि पाप से ग्रसित हो जाए तो फिर पुण्य नहीं आ सकता, और यदि पुण्य से ग्रसित हो जाए तो पाप नहीं आ सकता । वह किसी से भी ग्रसित नहीं होता । वह सदैव अस्पर्शित है । इस साक्षी का, इस आत्मा का संकल्पपूर्वक स्मरण समस्त कर्मों के बीच उसका भान, सब कुछ करते हुए,सोते,उठते,बैठते, व्यक्ति को अपने स्वरूपत: निर्दोष और शुभ होने का अवबोध करा देता है । इस बोध की दशा में ही प्रकृति का अतिक्रमण और परमात्मा का अनुभव होता है ।

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थोड़े मेरी प्रशंसा में
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