सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

ओशो और पतंजलि

ओशो हमारे युग के सर्वाधिक पढ़े जाने वाले,सुने जाने वाले प्रबुद्ध रहस्यदर्शियों में से हैं, जिन्होंने सत्य को यथा संभव हर तरह से कहने की कोशिश की है । पतंजलि पर ओशो को पढ़ना स्वयं की खोज की दिशा में एक सही कदम उन लोगों के लिए हो सकता है, जिनकी यात्रा योग के पथ से स्वयं के साक्षात्कार की ओर है । योग क्या है ? योग तंत्र से किस प्रकार भिन्न है ? योग और ताओ में क्या फर्क है ? योग और झेन में परस्पर क्या संबंध है ? लाओत्से पतंजलि से किस प्रकार भिन्न हैं ? योग की यात्रा किन लोगों के लिए है ? इन तमाम प्रश्नों का जवाब आपको ओशो की पुस्तक पतंजलि योग सूत्र में मिलेगा । ओशो द्वारा पतंजलि पर कुल 100 प्रवचनों में बोला गया है, जिनमें से 50 प्रवचन प्रश्नोत्तर रूप में और 50 प्रवचन पतंजलि के योग -दर्शन की व्याख्या पर केंद्रित हैं । ओशो के प्रवचन इस रूप में दिए गए हैं कि साधकों के प्रश्नों का निदान,समाधान साथ-साथ मिलता जाए । इसलिए प्रवचनों का क्रम इस प्रकार है कि एक अध्याय में व्याख्या सूत्र लिए गए हैं तो अगले अध्याय में प्रश्नोत्तर हैं, जिनमें साधकों की जिज्ञासाओं का समाधान है ।

पतंजलि के बहाने ओशो ने योग दर्शन की गहराइयों का संस्पर्श किया है । इन प्रवचनों को पढ़ना योग की गहराइयों में जाने के लिए द्वार हैं । यह पुस्तक पाँच भागों में प्रकाशित हुई है । हर भाग में 20 प्रवचन दिए गए हैं । योग दर्शन के समाधि, साधना,विभूति और कैवल्य पाद के सभी 194 सूत्रों की ओशो द्वारा व्यापक,विशद और गहन व्याख्या की गई है । इन प्रवचनों में योग के चारों पादों का जिस गहराई से वर्णन हुआ है और साधकों में योग को लेकर जो भ्रांतियाँ हैं, उनको दूर किया गया है, वह अनूपम कार्य है । इससे पूर्व ऐसा कार्य नहीं हुआ।

पतंजलि को आज के युग के अनुकूल बना कर प्रस्तुत करने के लिए ओशो का आभार किन शब्दों में किया जाए । हम चाहेंगे कि ओशो द्वारा पतंजलि पर बोले गए इन प्रवचनों का अधिक से अधिक पठन-पाठन हो, आप चाहें तो इन्हें सुन भी सकते हैं ? लेकिन ध्यान रहे कि पतंजलि पर ओशो ने अंग्रेजी में बोला है, और यह पुस्तक मूल रूप से सर्वप्रथम अंग्रेजी में "फ्राम अल्फ़ा टू ओमेगा" नाम से आई थी, जिसका सुन्दर अनुवाद मा योग निरूपम द्वारा किया गया है ।

इस पुस्तक को डायमन्ड समूह के प्रकाशक फ्यूज़न द्वारा अभी हाल ही में पेपर-बैक और हार्ड बाउन्ड में भी प्रकाशित किया गया है । इससे पूर्व इसके तीन राज संस्करण ओशो कम्यून द्वारा भी प्रकाशित हो चुके है ।

टिप्पणियाँ

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    इसे 06.03.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह ०६ बजे) में शामिल किया गया है।
    http://chitthacharcha.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  2. ओशो अतीत के पतंजलि को हमारे लिये इतना सुगम बना देते है कि लगता ही नहीं कि बात इतनी
    पुरातन है. मनोज भाई ! ओशो की मधुशाला आएसे ही सजाते रहिये!
    साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं…

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए ।
राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा…

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
0
0
0
होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा