मंगलवार, 5 जनवरी 2010

दफ्तर की ज़िन्दगी

दफ़्तर की जिंदगी कितनी निरस और उबाऊ होती है, इसका अहसास होने लगा है । दफ्तर में व्यक्ति का व्यक्तित्व खोने लगता है । उसकी आत्मा मरने लगती है । वह व्यक्ति नहीं बल्कि वस्तु अधिक होता है ; जिसका अधिकारी मनचाहा प्रयोग करते हैं । उसकी निजी स्वतंत्रता दफ़्तरी तंत्र में खो जाती है । एक तर्कसंगत और बुद्धिपूर्ण बात आप अपने से बड़े अधिकारी से मात्र इसलिए नहीं कह सकते कि वह आप से ऊँची कुर्सी पर बैठा है । यदि कहो तो यह बुद्धिहीनता और अनुभवहीनता को बताने वाली होती है । क्योंकि ऊँची कुर्सी पर बैठा अधिकारी चाटुकारिता का आदि है और उसकी नज़र में वह दुनिया का सबसे बड़ा समझदार व्यक्ति है । एक संवेदनशील व्यक्ति के लिए दफ़्तर नरक साबित होता है ।

(८ फरवरी १९९९, सोमवार को लिखी डायरी का अंश )

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