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हमारा मीडिया किस ओर जा रहा है ?

हमारा मीडिया किस दिशा में जा रहा है ? क्या आप थोड़ी देर मेरे साथ विचार करने को तैयार होंगे ? मीडिया चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या दृश्य-श्रव्य मीडिया । क्या वह अपने उद्देश्यों पर खरा उतर रहा है ? क्या वह जनतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में अपनी भूमिका बखूबी निभा रहा है ?

इन्हीं सवालों के जवाब खोजने के लिए मैं आपसे संवाद स्थापित करना चाहता हूँ । हमारे मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य मेरी नजर में है : लोगों को शिक्षित करना । उसका दूसरा उद्देश्य है लोगों को सूचना उपलब्ध कराना । मीडिया का तीसरा उद्देश्य है लोगो को उनके अधिकारों से अवगत कराना । मीडिया का चौथा उद्देश्य है सरकार की गलत नीतियों को जनता के समक्ष लाना और सबसे बढ़कर सरकार, न्याय और सत्ता के गलियारों की खोजबीन करना ताकि आम नागरिक के पैसों और अधिकार का दुरुपयोग न हो सके ... देश और देश की जनता के समक्ष सच को उजागर करना ।

मेरे देखे मीडिया आज इन कामों में से किसी को भी अंजाम नहीं दे रहा है । ऐसा प्रतीत होता है कि मीडिया स्वयं आज बीक चुका है, जो चंद लोगों के हितों का ध्यान रखता है । वह न तो लोगों शिक्षित कर रहा है । न ही सही सूचना ही लोगों तक पहुँचा रहा है । लोगों के अधिकारों से अवगत कराने वाले कार्यक्रमों का तो सर्वथा अभाव है । सरकार की , न्याय प्रणाली संबंधी खोजपरक पत्रकारिता तो कहीं दिखाई नहीं देती । मीडिया आज चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर रह गया है । वह विज्ञापनदाताओं के हितों के अनुसार कार्यक्रम बनाता है, उनका प्रसारण करता है और मीडिया-कर्मी स्वयं मीडिया की शक्ति का दुरुपयोग कर रहें हैं ।

मीडिया गरीबी की बात करता है, लेकिन गरीबों की बात नहीं करता ? वह गरीबी रेखा की बात करता है, लेकिन लोगों को यह नहीं बताता कि गरीबी रेखा क्या है ? वह महँगाई की बात करता है, लेकिन मँहगाई क्यों है, मुद्रास्फिति क्या है, इनके बारे में लोगों को जानकारी नहीं देता । एक तरह से मीडिया लोगों के मन को ब्लैक-मेल करने का काम कर रहा है । लोगों को परिस्थियों में उलझाने और किस्मत पर रोने के सिवाय वह क्या दे रहा है ।

टिप्पणियाँ

  1. बिका हुआ माल स्वामी अथवा स्वामिनी के झोले की शोभा बना रहता है !

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