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भाषा की क्लिष्टता

अक्सर लोग भाषा की क्लिष्टता की बात करते हैं । वस्तुत: भाषा क्लिष्ट नहीं होती । किसी भी भाषा में प्रयुक्त होने वाले शब्द परिचित या अपरिचित होते हैं । यदि हमें किसी भाषा के किसी शब्द का अर्थ मालूम नहीं है , तो हमें उस शब्द से परिचय प्राप्त करना चाहिए । शब्दों का परिचय विभिन्न स्रोतों से लिया जा सकता है; उदाहरणार्थ - शब्दकोश, समांतरकोश (थिजारस) आदि । शब्दों की उत्पत्ति होती है और शब्द मर भी जाते हैं । किसी शब्द की व्युत्पत्ति का अध्ययन इटायमोलॉजी में किया जाता है । शब्द तब तक जिंदा रहता है, जब तक वह व्यवहार में लाया जाता रहता है । आज शहरों में बहुत से देशज शब्द विलुप्त प्राय: हो गए हैं; क्योंकि उनका शहरों में प्रचलन बंद सा हो गया है ; जैसे कान्वेन्ट स्कूलों में पढ़े बच्चों को खाट, जुगाली, कुदाली, रैन्दा आदि शब्दों से अनभिज्ञता देखने को मिलेगी । क्योंकि शहरों में खाट (चारपाई)का प्रयोग लगभग बंद सा हो गया है, इसकी जगह अंग्रेजी का बैड या कॉट शब्द व्यवह्रत हो रहा है । शहरों में पढ़े बच्चों ने चौपायों के व्यवहार को भी नहीं देखा है, कि किस तरह से चौपाया पशु पहले बिना चबाए चारा खा जाते हैं और फिर बाद में बैठ कर दाँतों को चबाते रहते हैं, जिसे जुगाली कहते हैं; पशु इस तरह से अपने भोजन को पचाते हैं । इसी प्रकार जिन बच्चों ने कुदाली और रैन्दे के प्रयोग को कभी होते हुए नहीं देखा, या उनमें अपने आस-पास की चीजों को क्या कहते हैं, उनको जानने समझने की कोशिश नहीं की, वे उन शब्दों से अपरिचित रह जाते हैं । इसे एक अन्य उदाहरण से समझते हैं : अब हम ब्लॉगिंग करते हैं और हम ब्लॉग शब्द से परिचित हैं; लेकिन जिस दिन आपने ब्लॉग शब्द सबसे पहले सुना था, उस दिन इसकी संकल्पना से परिचित नहीं थे । धीरे-धीरे आपका इससे परिचय हुआ । आज हम पुरे विश्व से जुड़े हुए हैं । विभिन्न संस्कृतियाँ एक दूसरे के सम्पर्क में आ रही हैं । ऐसे में जाहिर है कि विभिन्न संस्कृतियों के खान -पान और रहन सहन में प्रयुक्त होने वाली चीजे एक दूसरे देशों तक आसानी से पहुँच रहीं हैं । अब भारत में भी पिज्जा खूब पसंद किया जा रहा है । लेकिन भारत में ऐसा कोई व्यंजन नहीं है, जिसकी तुलना पिज्जे से की जा सके । इसलिए इसे भारत में पिज्जा ही कहा जाए तो किसी को क्या आपत्ति हो सकती है और इसी प्रकार तकनीकी शब्दों के लिए अटपटे और हास्यास्पद शब्द गढ़ने का क्या तुक है । जैसे ई-मेल शब्द से हम सब परिचित हैं तो इसके लिए अणु-डाक जैसे शब्दों का प्रयोग करना या नेक-टाई शब्द के लिए कंठ-लंगोट या रेलगाड़ी के लिए लोहपथगामिनी शब्द या मोबाइल शब्द के लिए घुमंतु दूरभाष या कानाफूसी यंत्र जैसे शब्द गढ़ने की आवश्यकता नहीं है । सरल समाज में जब जरुरतें सीमित थी और तकनीक का विकास नहीं हुआ था, तब चीजों की तुलना करनी आसान थी और प्राय: हर संस्कृति/भाषा के शब्द दूसरी संस्कृति में मिल जाते थे । लेकिन आज ऐसा नहीं है । जो नई तकनीक आ रही है, उसका आज संपूर्ण विश्व में एक सा रूप होने के कारण उसे एक ही नाम से पहचाना और स्वीकार किया जाना चाहिए । लेकिन जो चीजें हम रोज देखते हैं और जिनके लिए हमारी भाषा में स्वयं का सुंदर और स्टीक शब्द है, उसके लिए अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग उचित नहीं । जो लोग ऐसा करते हैं, वे वस्तुत: भाषा का स्वरूप बिगाड़ते हैं । आज सुबह सैर करते हुए मैंने सुना, एक माँ अपने नन्हें बच्चे को कह रही थी- बेटा, ग्रास पर मत चलो, वह डर्टी है । यहाँ माँ बच्चे से यह कह सकती थी कि बेटा, घास पर मत चलो, वह गंदी है ।

निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि कोई भी शब्द क्लिष्ट नहीं होता । वह परिचित या अपरिचित होता है । अच्छा हो यदि हम व्यवहार में हमारी भाषा के उन सभी शब्दों का प्रयोग करते रहें जो हमारे अपने और सुपरिचित हैं ।

टिप्पणियाँ

  1. SAHI HAI APNI BHASHA KA PRAYOG KARNA HI CHAHIYE AUR ANYA SHABDON SE PARICHIT BHI HONA CHAHIYE

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  2. बिलकुल सही कहा आपने, भाषा को आपसी वार्तालाप के लिए बनाया गया था न की क्लिष्टता के लिए. हमने ही इसे क्लिष्ट बनाया है.
    इसको आपसी समझ से सरल करने की जरूरत है....................

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  3. सहमत हूं आपसे .. अपनी मातृभषा क्लिष्‍ठ कैसे हो सकती है !!

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  4. आपकी बातों से शत-प्रतिशत सहमत हूँ...
    बिना बात के भाषा को क्लिष्ट बनाने कि क्या ज़रुरत है....विदेशज शब्दों ने हमारी हिंदी को और समृद्ध किया है....बल्कि इस तरह के प्रयोग नयी पीढ़ी को भाषा से दूर ही ले जाते हैं...
    अब यहाँ विदेश में 'समोसा' पकौड़ी, साड़ी बोलते ही हैं न..कौन इनके अंग्रेजी शब्द बनाने कि कोशिश करता हैं....

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  5. मैं आपसे इत्तेफाक तो रखता हूँ।
    प्रचलित और सबकी समझ में आने वाली व्यवहार-कुशल हिंदी ही संपर्कभाषा का रूप ले सकती है। साहित्यिक और व्याकरण सम्मत हिंदी का आग्रह रख हम इसका विकास नहीं कर सकेंगे। सामान्य बोलचाल में प्रचलित अंग्रेज़ी, पुर्तगाली, अरबी, फ़ारसी, उर्दू से लेकर देश की तमाम बोलियों और प्रादेशिक भाषाओं के शब्दों के हिंदी में प्रयोग से सही अर्थों में यह जनभाषा बन सकेगी और तभी हिंदी और हिंदीतर भाषाईयों के बीच की दूरी पट सकेगी। हिन्दी की विकास यात्रा में इसे और अधिक प्रयोजनमूलक यानी फंक्शनल बनाया जाए। प्रयोजनमूलक हिन्दी जीवन और समाज की ज़रूरतों से जुड़ी एक जीवन्त, सशक्त और विकासशील हिन्दी भाषा है। आज ऐसी ही प्रयोजनमूलक हिंदी के ज़रिए हमारा प्रयास भारत के सभी प्रांतों, अंचलों और जनपदों को सौहार्द्र, सौमनस्य व परस्पर स्नेह से एक सूत्र में बांधने का होना चाहिए। तभी तो आज चक दे इंडिया हिट है।

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  6. कोई भी शब्द क्लिष्ट नहीं होता । वह परिचित या अपरिचित होता है ।

    -बिल्कुल सहमत हूँ आपसे...और अच्छे पठन से यह परिचय बढ़ाया जा सकता है.

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  7. bhasha ko lekar jo drishtikon hai aapka wo uchit hai ,hame apni bhasha ka samman karna chahiye ,sundar likha hai

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  8. सहमत हूँ श्रीमान..!

    बड़ा ही सकारात्मक ब्लॉग है आपका..!

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