शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

क्या तटस्थ होना बुरा है ?

क्या तटस्थ होना बुरा है ? तटस्थता क्या है ? मनुष्य तटस्थ क्यों होता है ? आइए आज इन्हीं विषयों पर चर्चा करें
तटस्थता का मतलब त्याग, संन्यास या वैराग्य नहीं है तटस्थता का मतलब अतिवादी होना भी नहीं है

तटस्थता का मतलब किसी विचार के पक्ष या विपक्ष में खड़े होना भी नहीं है तटस्थता का अर्थ मध्यम मार्ग भी नहीं है तटस्थ होने का अर्थ है मन की एक ऐसी अवस्था जब व्यक्ति विचार और व्यवहार में एकरूपता नहीं देखता दोनों के बीच एक गहरी खाई देखता है इस वैचारिक द्वंद्व के चलते व्यक्ति के पास विश्लेषण तो होता है, लेकिन यथार्थ की भूमि नहीं होती यह अवस्था साक्षी भाव की ओर ले जाने वाली द्वंद्वात्मक स्थिति है यानि इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं के भीतर झांकता है और चीजों को देखता है लेकिन उस संबंध में निर्णय देने की स्थिति में नहीं होता

इस स्थिति से उबरना तभी संभव है जब व्यक्ति वैचारिक स्तर और व्यवहारिक स्तर पर कोई संतुलित सत्य को देख पाता है और विचार और व्यवहार की असंतुलित खाई को पाटने की कोशिश करता है यह स्वयं की आलोचना भी नहीं है यह एक तरह से आत्मावलोकन है ; जिसकी साधना हमें आत्म साक्षात्कार की ओर ले जाती है

जो मनुष्य परिस्थितियों के भावनात्मक बंधनों से मुक्ति पा लेता है वह वह तटस्थ रह सकता है इसमें भूत से मुक्ति और भविष्य की स्थितियों हेतु स्वयं को तैयार करने में मदद मिलती है इसमें मनुष्य की सांसारिक छवि, जो झूठी और स्वयं व्यक्ति द्वारा निर्मित है, टूटती है और मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप के साक्षात्कार की ओर बढ़ता है यह आत्मावलोकन की आदर्श स्थिति है

वह तटस्थता जो व्यक्ति को विवेकशून्य करे और पलायनवादी बनाए, तटस्थता नहीं बल्कि जड़ता है जो उसे परिवर्तनशील नहीं होने देती निंदा और चुगली सांसारिक स्वार्थ सिद्धि के योग हैं इनसे व्यक्ति दूसरों से क्षणिक संतुष्टि पा सकता है, लेकिन आत्मतुष्टि नहीं जिम्मेवारी से जो बचता है, वह तटस्थ नहीं हो सकता कर्म करते हुए तटस्थ हुआ जा सकता है तटस्थ हुआ व्यक्ति स्वयं के कार्य के प्रति अधिक समर्पित होता है उसके कार्य की गुणवत्ता बढ़ जाती है उसके कार्यों से अशुद्धियाँ मिट जाती हैं

विचार के तल पर और व्यवहार के तल पर जो दूरी है; जिसके कारण व्यक्ति निष्कर्ष पर नहीं पहुँचता, यह द्वंद्वात्मक स्थिति ही तटस्थता को जन्म देती है तटस्थ व्यक्ति में विशेष अवलोकन शक्ति जाती है वह दूर की सोचता है निष्कर्ष तो जीवन यात्रा में एक पड़ाव से अधिक कुछ नहीं हैं आगे बढ़ने पर शायद तुम इन्हें भूल ही जाओ लेकिन तटस्थता चीजों के मूल स्वरूप को दिखाने वाली एक कला है इसकी साधना से विचार और व्यवहार में संतुलन साधा जा सकता है

5 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत ही बढ़िया लिखा है आपने तटस्थता पर! उम्दा प्रस्तुती!

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  2. इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं के भीतर झांकता है और चीजों को देखता है । लेकिन उस संबंध में निर्णय देने की स्थिति में नहीं होता ।


    -हम तो पूरे ब्लॉगजगत में इसी तटस्थता को लेकर बदनाम है, पोस्ट बहुत पसंद आई. कभी इंगित करने के लिए बुक मार्क कर रहा हूँ अपने पास. आभार!!

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  3. ओशो इस सन्दर्भ मे, बुद्ध की परम्परा का एक शब्द प्रयोग करते हैं जो है “तथाता”. “तथाता” यानि “जो है जैसा है उसे वैसा ही स्वीकार कर लेना”. “तथाता” , तटस्थता से भिन्न स्थिति है, यह स्वभावगत है किसी विशेष परिस्थिति या प्रयास या योजनाजन्य नही है.

    कनफ्युज़न को तटस्थता कहना खतरनाक भी हो सकता है. फिर निर्णय़ न लेना या न ले सकना भी तो एक निर्णय़ है.

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  4. तटस्थता कन्फ्यूजन की स्थिति नहीं हैं । व्यक्ति मात्र चीजों को किनारे पर खड़े होकर देखने वाला होता है । यह बुद्ध के तथाता से भिन्न है । तथाता में तो चीजों का पूर्ण स्वीकार होता है । लेकिन तटस्थता में चीजों का न स्वीकार होता है, न इन्कार । चीजें बस हैं...इसकी प्रतीती होती है । तटस्थ व्यक्ति न्यूट्रल होता है । वह चीजों को देखता है...लेकिन उनके संबंध में निर्णय नहीं देता । उनकी उपेक्षा भी नहीं करता । यह तटस्थता चीजों के स्वीकार या इंकार से भिन्न बस उनके होने का बोध भर है ।
    निर्णय न देना भी एक निर्णय है... यह सोची-समझी रणनीति है... लेकिन तटस्थ व्तक्ति चीजों के होने से इंकार नहीं कर रहा, वह सिर्फ उनके अच्छे-बुरे के संबंध में निर्णय नहीं देता । क्योंकि उसका निर्णय चीजों को बदल नहीं सकता । चीजें तो वैसी ही रहेंगी... जैसी वस्तुत: वे हैं । तटस्थ व्यक्ति इस तथ्य को समझता है कि उसके कहने या न कहने से चीजों में कोई अंतर नहीं आएगा । वे बनी रहेंगी, लेकिन इस समझ से उसका विवेक अंतस के द्वार खोल देता है...वह चीजों के भीतर झांकना सीख जाता है । यही अंतर्दृष्टि है ।

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