रविवार, 25 अप्रैल 2010

पढ़ना और समझना

जब मैं कुछ पढ़ता हूँ 
और उससे अर्थ ग्रहण करता हूँ 
और जब आप कुछ पढ़ते हैं
और उसका अर्थ ग्रहण करते हैं
यह जरूरी नहीं कि हमने जो पढ़ा 
और उसका जो अर्थ ग्रहण किया
वह वही है जो कि लेखक का रहा होगा
नहीं, बहुत कम संभावनाएँ हैं 
कि कोई लेखक अपना वास्तविक संदेश 
लोगों तक संप्रेषित कर पाए ।
यही कारण है कि बहुत सी पुस्तकों की 
बहुत सी टीकाएँ की जाती हैं 


व्यक्ति किसी बात से 
वही अर्थ लेता है जो वह समझता है 
और वह वही समझता है जो कि वह जीता है 
उसका जीवन दृष्टिकोण ही चीजों को अर्थ देता है
बहुत से लोग जो वातावरण से प्रदूषित हैं
उनका स्वयं का कोई दृष्टिकोण नहीं होता 
क्योंकि उनका स्वयं का कोई जीवन ही नहीं होता .

1 टिप्पणी:

  1. बचपन से जो गाँठ थी मन में आप ने उसमें एक और गिरह लगा दी... कई बार ख़ुद से पूछता था कि जो मैं पढकर समझ रहा हूँ, वह सही है या जो मास्टर ने समझाया वो सही है...कई बार एक कविता का अर्थ और व्याख्या लिखने में मेरे नम्बर काट लिए गए, क्योंकि मेरे भाव उन भावों से मेल नहीं खाते थे जो क्लास में पढाया गया या कुंजिकाओं में लिखा गया..जबकि मैं ग़लत हूँ ऐसा भी नहीं कहा किसी ने..आज आप ने यह सोचने पर विवश कर दिया कि मैं तब भी ग़लत था, जो समझता था कि मैंने कोई गलती नहीं की...जबकि सच यही था कि कवि ने तो कविता किसी और भाव से लिखी हो..
    (कृपया अपना ले आउट बदल लें, बहुत समय लगता है खुलने में)

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