रविवार, 11 अप्रैल 2010

सुनना, करना और समझना

सत्य की अनुभूति होती है किसी ज्ञानी जन से इसके संबंध में सुनने मात्र से प्राण परितृप्त नहीं होते इसके संबंध में शास्त्र पढ़ लेने पर भी सत्य की प्यास नहीं बुझती इस सत्य की प्यास तब तक नहीं मिटती जब तक कि यथार्थ में उसकी अनुभूति नहीं होती सुनने और सोचने से यह नहीं मिल सकता ठीक उसी प्रकार जैसे कि किसी मरुभूमि में यात्रा कर रहे यात्री के पास किसी जलाशय का सारा विवरण, नक्शा मौजूद हो लेकिन जब तक वह उस जलाशय तक की यात्रा तय नहीं कर लेता, तब तक उसकी प्यास नहीं मिट सकती बेशक कोई व्यक्ति जो उस दिशा से रहा है, प्यासे व्यक्ति को रास्ते का संकेत कर सकता है कि कुछ दूर जाइए, वहाँ तुम्हें दो पगडंडियाँ मिलेंगी एक दाहिनी ओर जाती है और दूसरी बाईं ओर जाती है तुम दाहिनी ओर जाना कुछ दूर जाने पर तुम्हें जलाशय मिलेगा और वहीं प्राणों को परितृप्त करनेवाला अमृत-तुल्य शीतल जल और छाँह भी क्या जलाशय और छाँह के वर्णन मात्र से प्यासा यात्री परितृप्त हो गया होगा ? नहीं, उसे शांति तो तभी मिली होगी जब उसने जलाशय तक की यात्रा कर यथार्थ रूप से जल का पान किया होगा इसी प्रकार आत्मा और सत्य के ज्ञान की बाते सुनने और उनके संबंध में सोचने से बुद्धि को शब्द ज्ञान तो हो जाता है; लेकिन यथार्थ अनुभूति नहीं हो पाती यथार्थ अनुभूति केवल बुद्धि से समझ लेना भर नहीं है इसके लिए जरूरी है ध्यान करना इसलिए जब कभी सुनो या पढ़ो तो करने के लिए सुनना या पढ़ना सुनने या पढ़ने से यह मत समझ लेना कि समझ गए नहीं प्यास तब तक बनी रहेगी, प्राण तब तक छटपटाते रहेंगे जब तक कि सत्य स्वयं अनुभूत नहीं हो जाता मंजिले चल कर ही पहुँची जाती हैं सब समझ लेने से भी प्राण परितृप्त नहीं होंगे ध्यान की यात्रा करनी ही होगी यह ध्यान समझने की चीज नहीं है यह करने के लिए है ध्यान में जब कर्ता छूट जाए और मात्र कर्म रह जाए तो ध्यान पूरा हुआ

3 टिप्‍पणियां:

  1. यह सच है मात्र पढ़ लेने से या सुन लेने प्राप्ति का संतोष नहीं मिलता...संतुष्टि मिलती है उसे भोगने से फिर चाहे वो सत्य हो, निर्धनता हो या मोक्ष.....
    नायाब प्रस्तुती...

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  2. अच्छी तरह सुनना और समझना बहुत जरूरी है। यदि इनमें से किसी में भी चूक हो गई तो फिर निर्णय में गलती हो सकती है। पोस्ट अच्छी लगी

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  3. आत्मा और सत्य के ज्ञान की बाते सुनने और उनके संबंध में सोचने से बुद्धि को शब्द ज्ञान तो हो जाता है; लेकिन यथार्थ अनुभूति नहीं हो पाती । यथार्थ अनुभूति केवल बुद्धि से समझ लेना भर नहीं है । इसके लिए जरूरी है ध्यान करना ।
    सत्य कहा आप ने ।
    वास्तव मे ध्यान का अर्थ है ही यही कि व्यक्ति अपने आपको जाने,आत्मा को जाने और अपनी चेतना को पवित्र करे।
    आप मेरे ब्लांक पर आये और टिप्पणी दी इस के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद ।आप के ब्लांक पर आना अच्छा लगा ।

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