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कुछ मुक्तक

जिंदगी हमसे इस कदर रुठी है
कि हर साँस का हिसाब माँग बैठी है
मोहब्बत हमसे इस कदर रुठी है
कि हर पल के साथ का हिसाब माँग बैठी है

दिल था हमारा एक छोटा सा
उसमें भी तुम्हारा अक्श था
जो तुम्हारी साँसों से धड़कता था
आज वही तार-तार है बेजान सा


क्यों हमसे इतनी परीक्षा ली जा रही है
हम तो बस वही थे जो तूने बनाया
इसे कोरा बनाए रखना भी क्या गुनाह है
इस अनुभवी लोगों की दुनिया में

टिप्पणियाँ

  1. साथ साथ चलते चलते,कब कोई सिर्फ पास पास चलने लगता है पता नहीं चलता... अनपढ हैं वो जो कोरे काग़ज़ को नहीं पढ सकते, क्योंकि लिखे को तो हर कोई बाँच सकता है, कोरेपन को जो बाँचे वो सुजान...अंतर्मन की व्यथा व्यक्त करता ये मुक्तक...

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  2. sunadar rachna

    waqy me gajab ka muktak he


    bahut khub

    shkhar kumawat

    http://kavyawani.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. sir ji bahut acha bas 'Aks' ko ek baar sahi kar de

    http://dilkikalam-dileep.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  4. दिलीप जी !!! धन्यवाद भूल सुधार दी गई है ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. दिल था हमारा एक छोटा सा
    उसमें भी तुम्हारा अक्श था
    जो तुम्हारी साँसों से धड़कता था
    आज वही तार-तार है बेजान सा..
    बहुत सुन्दर मुक्तक है! बढ़िया लगा!

    उत्तर देंहटाएं
  6. दिल था हमारा एक छोटा सा
    उसमें भी तुम्हारा अक्श था
    जो तुम्हारी साँसों से धड़कता था
    आज वही तार-तार है बेजान सा

    बहुत वेदना दिख रही है इन पंक्तियों में....भावपूर्ण रचना..

    उत्तर देंहटाएं
  7. क्यों हमसे इतनी परीक्षा ली जा रही है
    हम तो बस वही थे जो तूने बनाया
    इसे कोरा बनाए रखना भी क्या गुनाह है
    इस अनुभवी लोगों की दुनिया में
    antah man ki peeda ubhar aai is sawal me ,aashavadi bane rahne ke liye yahi kah sakte hai ki ye jeevan hai is jeevan ka yahi hai rang roop .ya sabko mukammal jahan nahi milta .achchhi rachna .

    उत्तर देंहटाएं

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