सोमवार, 12 अप्रैल 2010

बढ़ते शहर घटती कृषि योग्य जमीन





जब मैं छोटा बच्चा था और अपने गाँव से चंडीगढ़ आना होता था, तो सड़कों के दोनों ओर कितना मनोहारी दृश्य होता था । सड़क के दोनों ओर से प्रकृति की सुंदर छटाएँ देखने को मिलती थी । रबी की फसलें जब अपने यौवन पर होती थी, तब दूर-दूर तक सरसों के पीले फूलों से पीली हुई धरती यूं लगती थी मानो धरती ने पीले वस्त्र ओढ़ लिए हों । लेकिन आज जब इन्हीं सड़कों से यात्रा करता हूँ तो खेत-खलिहान की जगह मुझे दिखाई देती हैं बड़ी-बड़ी सिमेंट कंकरीट की गगनचुंबी इमारतें । दिल्ली से चंडीगढ़ की जी.टी.रोड पर अब वो प्रकृति के नजारे कहाँ नजर आते हैं । जहां खेत होते थे वहाँ आबाद हो गए हैं शहर और शहरों में खो गए वो खेत और खलिहान । कई बार सोचता हूँ कि पंजाब और हरियाणा देश के दो बड़े अन्न उत्पादक राज्य हैं, यहीं उत्तम किस्म का चावल पैदा होता है और गेहूँ तो सारे देश को ये राज्य देते ही हैं । इन उपजाऊ भूमि वाले प्रदेशों पर कंकरीट के ये जंगल यूँ ही बढ़ते रहे तो आने वाले वर्षों में देश को अनाज कौन पैदा करके देगा । क्या हमारी सरकार के पास इस दिशा में सोचने और नीति बनाने की कोई योजना है ? जो इन राज्यों में बढ़ते शहरीकरण को रोक सके । इन प्रदेशों के कितने ही किसान अपनी उपजाऊ भूमि को शहरीकरण हेतु बेच चुके हैं और अंधाधुन आए पैसे से पगला गए हैं । क्या सरकार नए शहरों को बसाने के लिए ऐसे क्षेत्रों का चयन नहीं कर सकती, जो बंजर हैं और जहाँ कृषि नहीं हो सकती ? क्या ऐसी उपजाऊ भूमि पर कंकरीट के माल्स और बड़ी-बड़ी बहुमंजिला इमारतें खड़ी करके हम देश के भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं कर रहे ? क्या हमारी सरकारें इस ओर ध्यान देंगी ?

हमें भविष्य के लिए अभी से सचेत होना होगा । हमारी सरकारें, हमारे डैवल्पर्स और बिल्डर देश के भविष्य के लिए सोचें और देश की उपजाऊ भूमि पर यूँ कंकरीट के जंगल न खड़ा करें । शहर बसाने के लिए उन इलाकों का इस्तेमाल किया जा सकता है जहाँ कि भूमि बंजर है और जहां कृषि नहीं हो सकती ।

3 टिप्‍पणियां:

  1. उपजाऊ कृषि भूमि का यूँ शहर बन जाना दुखद तो है परन्तु यह होता ही रहेगा।
    घुघूती बासूती

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  2. हम सभी जो कहीं न कहीं गाँव से जुड़े रहे हैं समझ सकते हैं आप की व्यथा... इन कंक्रीट की मीनारों ने धरती की कोख इस तरह कुचली है कि कई सदियाँ हरियाली को तरस जायेंगी...खेतों में चिमनियों का धुँआ भरा है और साँस लेना दूभर है... किसे सुनाई देती है कराह धरती की...

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