सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पढ़ने की कला

लोगों में पढ़ने की आदत दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है । इसके कई कारण हैं । शिक्षा का ढ़ाँचा भी बहुत बदल गया है । शिक्षा ज्ञान प्राप्ति के लिए नहीं डिग्री के लिए ली जा रही है । पुस्तक पढ़ने का लोगों के पास समय नहीं है । फिर लोगों के नौकरी-पेशे ऐसे हो गए हैं कि वे उन्हीं में उलझ कर रह जाते हैं । समाज के उच्च वर्ग ने पुस्तकों की जगह अन्य साधन अपना लिए हैं । मध्यम वर्ग के लिए पुस्तकें महंगी हैं । वह पुस्तक खरीद कर पढ़ नहीं पा रहा है । पुस्तकालय जाने का चलन भी बहुत कम हो गया है । पुस्तकालयों में पुस्तके धूल चाट रहीं हैं । दूसरी ओर ज्ञान का विस्फोट भयंकर हुआ है । पिछले २० सालों में ज्ञान में जो वृद्धि हुई है, वह पिछले १००० सालों में नहीं हुई थी । किसी भी व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं रखी जा सकती कि वह संसार का नवीनतम ज्ञान रखता है । विषयों की बहुलता और लगातार बढ़ती पुस्तकों में से अपनी पसंद का विषय व पुस्तकें चुनना तक कठिन हो गया है । इसलिए किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए यह जरूरी है कि वह अपने पेशे से जुड़े विषय के साथ कोई एक अन्य विधा जरूर चुने जैसे साहित्य में कविता,कहानी,उपन्यास,नाटक, रिपोर्ताज, संस्मरण आदि; दर्शन में भारतीय दर्शन या पाश्चात्य दर्शन, मनोविज्ञान में बाल मनोविज्ञान, स्त्री मनोविज्ञान, शिक्षा मनोविज्ञान आदि और उस विषय में अपनी पकड़ मजबूत बनाए । अपनी पसंद के विषय में क्या कुछ नया प्रकाशित हो रहा है, इसकी जानकारी एकत्रित करे और विषय के संबंध में समकालीन लेखकों से परिचय प्राप्त करे । बहुत से विषयों का सतही ज्ञान रखने से बेहतर है एक ही विषय का गहराई से अध्ययन किया जाए और उसके विभिन्न आयामों का अध्ययन किया जाए । अध्ययन के साथ-साथ चिंतन और मनन भी जरूरी है । बिना चिंतन मनन के कोई भी विषय आत्मसात नहीं होता । एक सफल पाठक ही सफल लेखक हो सकता है । यदि आप ब्लॉग लिखते हैं तब तो आपको बहुत जागरुक पाठक बनना पड़ेगा । तो किसी एक विषय को चुनिए और उसका नियमित अध्ययन जारी रखिए ...पढ़े हुए पर चिंतन और मनन कीजिए ताकि वह विषय आपका अपना हो जाए...आपकी रग-रग में रच-बस जाए ।

टिप्पणियाँ

  1. एक विषय जो सदा स मेरे मन को छूता था, आपने उसे जगा दिया... आपने जो बात कही उसका उत्तर ओशो ने एक वाक्य में दिया है कि आज “आश्चर्य” समाप्त हो गया है… कोई बच्चा आश्चर्य नहीं करता कि ऐसा है तो क्यों है... या यूँ होता तो क्या होता... और फिर माँ बाप की थोपी गई पढाई … मैं साहित्य पढने से वंचित कर दिया गया और आज हर रोज़ एक नए आसमान से गिरकर किसी नए खजूर में अटक जाता हूँ...पढना नहीं छोड़ा है आज तक..
    बहुत लम्बा आत्मकथ्य हो गया ..धन्यवाद मुझे मुझसे मिलाने के लिये, इस पोस्ट के द्वारा..

    उत्तर देंहटाएं
  2. एक सफल पाठक ही सफल लेखक हो सकता है -एकदम उचित सलाह!

    उत्तर देंहटाएं
  3. yah sawal aaj kaiyo ke man me ghar kiye hai ,main pustak lene jaati hoon to dukandaar khud dukhi hokar is prashn ko uthate hai ,kya kare ya to shauk nahi hai ya waqt ,ab t.v. ke serial avam program khali samya ko bharne me sahayak hai ,aese me in kitabo ki jaroort kam hi nazar aati hai ,ek saarthak vishya raha .

    उत्तर देंहटाएं
  4. बात तो आपने लाख टके की कही है......पर फिलहाल पढने की आदत पी़ढ़ी दर पीढ़ी डालने की रिवाज जारी रहे तो जल्दी खत्म नहीं होगी....आखिर किताबें ही हैं जो न बिजली की मोहताज हैं न ही जगह की.....जैसे चाहिए पढ़िए ..चाहे तो मुंह पर रख कर सो रहिए....ये सुविधा कम्पयूटर में कहां भई...

    उत्तर देंहटाएं
  5. जी सही कहा आपने ....अच्छे लेखक के लिए अध्ययन बहुत जरुरी है ......!!

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दरता से आपने सही बात का ज़िक्र किया है! सिर्फ़ लेखक के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए अध्ययन अति आवश्यक है!

    उत्तर देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

चमार राष्ट्रपति

लिंकन अमेरिका का राष्ट्रपति हुआ । उसका बाप एक गरीब चमार था । कौन सोचता था कि चमार के घर एक लड़का पैदा होगा, जो मुल्क में आगे खड़ा हो जाएगा ? अनेक-अनेक लोगों के मन को चोट पहुँची । एक चमार का लड़का राष्ट्रपति बन जाए । दूसरे जो धनी थे और सौभाग्यशाली घरों में पैदा हुए थे, वे पिछड़ रहे थे । जिस दिन सीनेट में पहला दिन लिंकन बोलने खड़ा हुआ, तो किसी एक प्रतिस्पर्धी ने, किसी महत्वाकांक्षी ने, जिसका क्रोध प्रबल रहा होगा, जो सह नहीं सका होगा, वह खड़ा हो गया । उसने कहा, "सुनों लिंकन, यह मत भूल जाना कि तुम राष्ट्रपति हो गए तो तुम एक चमार के लड़के नहीं हो । नशे में मत आ जाना । तुम्हारा बाप एक चमार था, यह खयाल रखना ।" सारे लोग हँसे, लोगों ने खिल्ली उड़ाई, लोगों को आनंद आया कि चमार का लड़का राष्ट्रपति हो गया था । चमार का लड़का कह कर उन्होंने उसकी प्रतिभा छीन ली ।फिर नीचे खड़ा कर दिया । लेकिन लिंकन की आँखें  खुशी के आँशुओं से भर गई । उसने हाथ जोड़ कर कहा कि मेरे स्वर्गीय पिता की तुमने स्मृति दिला दी, यह बहुत अच्छा किया । इस क्षण में मुझे खुद उनकी याद आनी चाहिए थी । लेकिन मैं तुमसे कहूँ, मैं…

राष्ट्रभाषा, राजभाषा या संपर्कभाषा हिंदी

आज हिंदी को बहुत से लोग राष्ट्रभाषा के रूप में देखते हैं । कुछ इसे राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित देखना चाहते हैं । जबकि कुछ का मानना है कि हिंदी संपर्क भाषा के रूप में विकसित हो रही है । आइए हम हिंदी के इन विभिन्न रूपों को विधिवत समझ लें, ताकि हमारे मन-मस्तिष्क में स्पष्टता आ जाए ।
राष्ट्रभाषा से अभिप्राय: है किसी राष्ट्र की सर्वमान्य भाषा । क्या हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है ? यद्यपि हिंदी का व्यवहार संपूर्ण भारतवर्ष में होता है,लेकिन हिंदी भाषा को भारतीय संविधान में राष्ट्रभाषा नहीं कहा गया है । चूँकि भारतवर्ष सांस्कृतिक, भौगोलिक और भाषाई दृष्टि से विविधताओं का देश है । इस राष्ट्र में किसी एक भाषा का बहुमत से सर्वमान्य होना निश्चित नहीं है । इसलिए भारतीय संविधान में देश की चुनिंदा भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में रखा है । शुरु में इनकी संख्या 16 थी , जो आज बढ़ कर 22 हो गई हैं । ये सब भाषाएँ भारत की अधिकृत भाषाएँ हैं, जिनमें भारत देश की सरकारों का काम होता है । भारतीय मुद्रा नोट पर 16 भाषाओं में नोट का मूल्य अंकित रहता है और भारत सरकार इन सभी भाषाओं के विकास के लिए संविधान अनुसा…

मेरी सेवानिवृत्ति

एक दिन मैं भी
ऐसे ही सेवानिवृत्त हो
कर
जाउंगा कार्यालय से

लोग अनमने मन से
मुझे भी कुछ हार पहनाएंगे
थोड़े मेरी प्रशंसा में
वे शब्द कहेंगे
जिनमें न रस होगा
न ताज़गी
और फिर खाने-पीने
का दौर शुरु हो जाएगा

तब मैं घर लौट आऊंगा
और लोग धीरे-धीरे
मुझे भूल जाएंगें
कार्यालय वैसे ही चलता
रहेगा
जैसे आज चलता है
बस मैं न रहूंगा
न मेरे हस्ताक्षर होंगे
0
0
0
होगा एक विराट शून्य
जिसमें धीरे-धीरे
सब समा जाएगा
और अस्तित्व अपनी
एक महायात्रा पूरी
कर चुका होगा